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इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ये दोनों हिस्से एक-दुसरे से जुडे़ हैं। कोकण और नासिक में बडे़ -बड़े सत्याग्रह हुए। वे ना होते तो हमें जो राजनीतिक सŸा प्राप्त हुई है वह प्राप्त न होती। नासिक सत्याग्रह के वक्त मैं लंदन में था। उस सत्याग्रह के कारण ऐसी हलचल मची कि वहां लंदन टाइम्स में हर रोज उसके बारे में खबरें छपती थीं। अंग्रेज लोग भी उन खबरों के बारे में आश्चर्य प्रकट करते थे। एकता के बल पर नासिक के लोगों ने इतना बड़ा काम किया था। लेकिन बडे़ दुःख के साथ मुझे कहना पड़ रहा है कि वही नासिक जिला अब अपने पैर पीछे खींच रहा है। वहां के लोगों ने मानों सार्वजनिक कार्य से संन्यास ले लिया है। और यह सब क्यों हो रहा है? तो केवल व्यक्तिद्वेष के कारण। इगतपुरी की घटना को इसके एक उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। वहां एक बार अस्पृश्यों की सभा हो रही थी। वहां इस बात पर विवाद छिड़ा कि उस सभा का अध्यक्ष कौन बनेगा? आखिर एक खंभे को अध्यक्ष बना कर सभा का कामकाज आगे बढ़ाना पड़ा। अध्यक्ष कौन बनेगा? सचिव कौन बनेगा? कोषाध्यक्ष कौन बनेगा? इन्हीं बातों को लेकर एक-दूसरे से ईर्ष्या की जा रही है। एक-दूसरे से द्वेष किया जा रहा है। अगर यही हाल कायम रहा तो इतने परिश्रम के बाद पाया हुआ यह मौका व्यर्थ चला जाएगा। मान लीजिए कल नासिक को एक प्रतिनिधित्व मिले तो आप उसी को चुनें जो बिना किसी स्वार्थ के काम करेगा। कौन सयाना है और कौन नहीं है इस बारे में सोचिए। सम्मान पाने के भूखे लोगों की मूर्खता का शिकार ना बनें। दीपक भले किसी के हाथों जले, रोशनी ही देता है, इसलिए दीपक जलना जरूरी है। आपस की फूट को खत्म करिए। अपनी खामियों से पार पाने का ज्ञान प्राप्त कीजिए। सभाओं में प्रस्ताव पारित किए जाते हैं उन पर ध्यान दीजिए। अड़चनों से पार पाने के रास्ते तलाश लीजिए। नारू (रोग) हो जाए तो उसके बारे में बातें ना बनाइए। उसे ठीक करने के लिए इलाज कीजिए। हालात के बारे में जान लीजिए। हालात के बारे में कोई आपके घर आकर आपको जानकारी नहीं देगा। इसके लिए ‘जनता’ अखबार
खरीदा कीजिए। एक और बात के बारे में मैं आपको आगाह करना चाहता हूं। पुणे अनुबंध हुआ लेकिन हिंदुओं को वह तहे दिल से नापसंद है। सच पूछो तो हम हिंदू धर्म की रक्षा कर सकते हैं। लेकिन हिंदू लोग ऐसे हैं, कि पुणे अनुबंध का फायदा आपकी झोली में वे पड़ने नहीं देना चाहते। कल हिंदू और मुसलमान कौंसिल में एक होकर आपको कंकड़ की तरह चुन कर अलग कर देंगे। सŸा के बंटवारे को लेकर हममें संघर्ष होंगे और उस लड़ाई-झगडे़ में हमें हमारा हिस्सा मिलना ही चाहिए। महाभारत में भी कौरव-पांडवों के बीच युद्ध हुआ था। लेकिन उसमें भीष्माचार्य को पांडवों की सही स्थिति का पता होने के बावजूद कौरवों का दाना-पानी लेते रहने के कारण उन्हें कौरवों का ही साथ देना पड़ा था। अर्थात्, ’अर्थस्य पुरुषो दासः’ अर्थात् आदमी पैसे का गुलाम है, जैसी अपनी हालत होने न दें। लोगों के दांव-पेंच