4. समाज जीवन में निरपेक्ष कर्तव्य भावना से संघर्ष करना चाहिए - मई 1924 मुंबई - Page 40

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न होते। आज हम सबसे नीचे हैं फिर भी इस हिंदू-मुस्लिम संस्कृति के संग्राम में हमारी संख्या को देखते हुए हमारी रसद् मदद बहुत महत्वपूर्ण है और अगर हमने अपने में संघशक्ति पैदा की तो हम जो मांगेंगे वह हमें मिलेगा। मेरा विश्वास है कि आज की बीसवीं सदी में जिन हिंदुओं को अस्पृश्यता नष्ट करने के लिए कहने पर जवाब देते हैं कि धूल खा रहे पुराणों से पूछते हैं। वही लोग इस संघर्ष के कारण उन पुराणों को जला कर हमें समाविष्ट कर लेंगे। क्योंकि इसका कोई इलाज नहीं है, वक्त ही ऐसा आ गया है।

हमारा समाज हर तरह से पिछड़ा हुआ है। आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है, मानसिक शक्ति में पिछड़ा हुआ है। जिस समाज के लोगों को राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक असमानता और अन्याय से अनगिनता की यातनाएं हो रही हैं। जिससे सारे लोगों को गहन अंधकार ने घेरा हुआ है। जिसे विपिŸा के कारण होने वाली यातनाएं सहनी (झेलनी) पड़ रही हैं। और उसे दूर कैसे करें यह समझ में नहीं आ रहा। इन लोगों के सभी क्षेत्रों में चल रहे जीवनकार्य का आखिर क्या परिणाम होगा, यह कह पाना मुश्किल है। इसके लिए उन लोगों को जिन्होनें स्थिति को साफ-साफ समझ लिया है, और जिनके मन में कर्तव्यबुद्धि और परोपकार की भावना पूरी तरह जागृत हुई है उन्हें अपने समाज के जीवन के संघर्ष में, अपने समाज का अस्तित्व बचाने के लिए निरपेक्ष भावना से दिन-रात प्रयत्न करना चाहिए। इन विचारों को समझने के बाद भी जो चुप बैठे रहेंगे वे अपने भाइयों पर विपन्नावस्था लाने और उनका नाश करने के जिम्मेदार होंगे। इसलिए शिक्षित बंधुओं यदि तुम्हें औरों से और भावी पीढी से श्रेष्ठ कहलवाना हो, अपने आज के हालात को सुधार कर अपने बच्चों का भविष्य भी संवारने की इच्छा हो, अपने नौनिहालों की (नाती-पोतों की) स्थिति बुरी न हो ऐसी अगर आपकी इच्छा हो, तो जिस बुराई और दुराचार के कारण अपने लोगों की बुद्धि का, कीर्ति का और परिस्थिति का विनाश हो रहा है, उसे दूर करना, उसका यथाशक्ति निर्मूलन करना आपका कर्तव्य बनता है। यह कर्तव्य आपको जरूर और जरूर पूरा करना चाहिए इतना कह कर मैं अपना वक्तव्य पूरा करता हूं।