65. कोकणस्थ, देशस्थ का भेद मुझे मंजूर नहीं - फरवरी 1933 मुंबई - Page 391

374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कोई भी समझदार आदमी यह बात समझ सकता है कि ये बहुत ही टुच्चे, बेकार के आरोप हैं। यह स्थिति सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी सार्वजनिक सभा में उनका जिक्र करना पड़ रहा है। हालांकि कई बार छोटी-छोटी बातें भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। इनमें से पहला आरोप सफेद झूठ है। कोकणस्थ लोगों से मेरा कोई बैर नहीं है। मैं खुद कोंकण से हूं, लेकिन मैंने कभी कोकणस्थ-देशस्थ जैसा भेदभाव नहीं किया। हां, यह बात सही है कि शिक्षा के प्रसार के दृष्टिकोण से कोकणस्थ महार पिछड गए हैं। उन्हें इस बारे में जितना हो सके ध्यान देना चाहिए। दूसरे आरोप के बारे में इतना ही कह सकता हूं कि हर किसी को अपनी औकात पहचान लेनी चाहिए। जाधव अगर अपनी योग्यता साबित करते तो उन्हें उस पद से हटाने की नौबत ही नहीं आती। छात्रावास कोई आढ़तिए या दलाल द्वारा चलाई जा सकने वाली जगह तो है नहीं। सुपरिटेंडेंट द्वारा अपने आदर्श बर्ताव से बच्चों के आगे आदर्श उपस्थित करना चाहिए। छात्रों को सजा देना यही एकमात्र काम नहीं होता। लेकिन ये जिम्मेदारियां जब जाधव पूरी नहीं कर पाए, तो संस्था के हित को ध्यान में रखते हुए उन्हें हटाए बगैर कोई चारा ही नहीं रहा। और इस बोर्डिंग को सरकारी मदद भी मिलती है इसलिए संस्था अगर सही ढंग से नहीं चलाई गई तो सरकार को जवाब भी देना पडे़गा। अबके बाद ठाणे और महाड के छात्रावास एक कमेटी चलाएगी और उस कमेटी के अध्यक्ष हैं, सुभेदार सवादकर। तीसरा आरोप दल के बारे में है। हां, दल में यदि एकता नहीं हो तो उसमें अनुशासन नहीं रहेगा। चौथा आरोप यह है कि हमारे आंदोलन में ब्राह्मण, कायस्थ, भंडारी आदि जाति के लोग क्यों हों? इसका सीधा, सरल, आसान जवाब मैं देता हूं, ताकि आप समझ जाएं। आप जब बीमार होते हैं, तब डॉक्टर के पास जाते हैं। तब अगर वह महार नहीं होगा तो क्या आप उसके पास नहीं जाएंगे? नहीं! फिर इस बारे में आपके मन में आशंका क्यों है?

आज कटु शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा इसका मुझे बड़ा दुःख है, लेकिन कटु कर्त्तव्य के तौर पर मुझे यह करना पड़ा। इस तरह की स्थितियां पैदा न होने देना आपके ही हाथ में है।“

यह कह कर डॉ. बाबासाहेब ने अपना भाषण पूरा किया। बाद में अध्यक्ष ने कार्यक्रम के समापन में कहा कि अब के बाद अगर आपको कोई अफवाहें फैलाता हुआ नजर आया तो आप उसका हाथ पकड़कर तुरंत उसे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के पास ले जाएं। तब आपकी समझ में आएगा कि वह आपको किस तरह बरगला रहा है। आपकी गलतफहमी दूर हो जाएगी। सुभेदार सवादकर, श्री उपशाम, डी. वी. प्रधान, कमलाकांत चित्रे, शिवतरकर मास्तर आदि लोग सभा में उपस्थित थे। उन लोगों को फूलों की मालाएं अर्पण की गईं। फिर सभा समाप्त हुई।