66. लोगों की धर्म भीरूता का फायदा उठाने वालों से चौकस रहें - मार्च, 1933 मुंबई - Page 394

377

इस सम्मान पत्र में मेरे गौरव में जो भी कुछ लिखा गया है, वह कहां तक सच है, यह कहना कठिन है। लेकिन, एक बात सच है कि मेरी प्रशंसा में अलंकारयुक्त भाषा का प्रयोग करते हुए आपने अपने जैसे ही एक इंसान को अच्छे गुणों से परिपूर्ण ईश्वर बना दिया है। इसे अगर सच मान लिया जाए, तो कहना पडे़गा कि आपकी भावनाएं स्वहितनाशक हैं। मैं यही मानता हूं और इसीलिए एक चेतावनी के रूप में पहले दो शब्द कहना जरूरी मानता हूं। किसी को ईश्वर बना कर अपने उद्धार का भार उस पर डालने से आप अपने कर्त्तव्य से मुंह मोड़ लेते हैं। इस भावना से अगर आप चिपके रहे तो आप प्रवाह के साथ बहने वाले लकड़ी के तने बन जाएंगे। आपके अंदर की शक्ति बेकार हो जाएगी और फिर इस नए युग में आपको मिली राजनीतिक सŸा बेकार जाएगी। आज तक आपने इस नादान भावना को अपने मन में घर बनाने दिया और इसीलिए उसने आपके वर्ग का सत्यानाश किया है। इससे आगे जाकर मैं यही कहूंगा कि इस तरह की नादान भावना ने आपका ही नहीं पूरे हिंदू समाज का नाश किया है। अपने इस हिंदुस्तान देश की हीनता का कोई कारण होगा तो वह यह दैवत्व ही है।

अन्य देशों के लोग समाज में अगर कोई बखेड़ा खड़ा हो जाए, या समाज पर कोई संकट आ जाए, तो एकता से तथा पूरे सामर्थ्य से अपना उद्धार मुक्ति करवा लेते हैं। लेकिन हमारे धर्म ने हमारी यह धारणा बना दी है कि इंसान कुछ नहीं कर सकता। समाज पर जब कोई बड़ा संकट आता है, या समाज की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है तब भगवान अवतार लेकर आते हैं और संकट का निवारण करते हैं। इस कारण लोग मिल-जुल कर संकट का सामना करने के बजाय ईश्वर के अवतार का इंतजार करते रहते हैं।

हमारा हिंदू धर्म पुरातन है, ऐसी शेखी बघारते कहा जाता है कि ग्रीक, रोमन आदि पुरातन और प्रसिद्ध राष्ट्र नष्ट हुए लेकिन हमारा हिंदू समाज अभी भी जीवित है। हालांकि केवल जिंदा रहने का कोई महत्व नहीं। इंसान इज्जत के साथ जीता है या नहीं इसका महत्व है। इस नजरिए से देखें तो हिंदू समाज ने जिंदा रह कर क्या दिग्विजय किए हैं, इस बारे में सोचना होगा। अन्य लोगों का दासत्व स्वीकारने के अलावा हमने किया ही क्या है? इस तरह जीने का कोई मतलब नहीं है। किसी का गुलाम होकर 100 साल जीने से मर्दानगी के साथ दो दिन जीना कई गुना बेहतर है। दो लोगों की टक्कर में एक अगर पलायन करता भी है, तो वह भाग कर जिंदा रहता है, और दूसरा दुश्मन को हरा कर जिंदा रहता है। पलायन करने वाला या दासत्व को स्वीकार करने वाला अपने किए से क्या हासिल करता है? वह दूसरे का गुलाम बनता है, स्वत्व भूल जाता है, गुलामों की संख्या बढ़ाता रहता है और नामर्दों की फौज खड़ी करता है, नामर्दगी फैलाता है। क्या मरना इससे बेहतर नहीं