378 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
होता? हिंदू समाज दूसरों का दास बन कर ही क्यों जीवित रहा, इस बारे में सोचें तो एक बात ध्यान में आती है और मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हर बार उसने अपनी आज़ादी/मुक्ति के लिए ईश्वर का इंतजार किया।
इस दुनिया में ईश्वर हो या ना हो, इस बात पर विचार करने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं है। पर एक बात निश्चित है कि इस दुनिया में जो कुछ घटता है वह सब इंसान का ही किया धरा होता है। कुछ पढे़-लिखे लोग अन्य लोगों को अज्ञान के अंधेरे में रखते हैं, उन्हें ईश्वर की झूठी कल्पनाओं के पीछे लगा कर, उनकी धर्म में विश्वास करने की आस्था, आदत का फायदा उठाते हैं और अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। क्योंकि, इस उपाय से आपकी संगठन की शक्ति खत्म होती है और आप बकरियों की तरह खोखली भावनाओं में उलझ कर रह जाते हो और आपको पूरी तरह लूटने के इरादे में उन्हें सफलता मिलती है। आज हमारी हालत दीन-हीन हुई है। इस स्थिति से बाहर निकल कर अपना फायदा करवाना हो तो ऐसी मिथ्या कल्पनाओं से अपने आप को मुक्त रखना आवश्यक है। आप सबको, महिलाओं और पुरुषों को इस बात पर यकीन रखना होगा कि आपका उद्धार करने के लिए कोई और आने वाला नहीं है। मैं भी आपका उत्थान नहीं कर सकता। अगर ठान लो तो आप स्वयं समर्थ बन कर अपना उन्नति/उत्थान कर सकते हैं। एक बात कहने में मुझे बड़ी खुशी हो रही है कि अपने वर्ग में सभी तरफ वातावरण में आंदोलन की हवा चल रही है। हालांकि इस तरह जागृति होने के बावजूद आपको मैं एक और महत्वपूर्ण बात बताना चाहता हूं कि अबके बाद आपका भविष्य अन्य किसी बात में नहीं, राजनीति में ही है। पंढरपूर, त्र्यंबकेश्वर, काशी, हरिद्वार आदि जगहों की यात्रा कर या शनिमहात्म्य, शिवलीलामृत, गुरुचरित्र आदि पोथियों का पाठ कर कर या एकादशी, सोमवार आदि व्रत कर, आपका उत्थान नहीं होगा। आपके माता-पिता पिछले हजारों सालों से यही सब करते आए हैं। इसके बावजूद क्या आपकी दयनीय स्थिति में बाल भर का भी फर्क भी आया है? वही, पहनने के लिए फटे कपडे, खाने के लिए अधपकी रोटी के टुकड़े, ढोरों से गंदा आपका रहन-सहन, मुर्गियों की तरह रोगों के कारण फटाफट दम तोड़ने की निर्बलता ने आज तक आपका पीछा नहीं छोड़ा है। सोचिए क्या यही आपकी अब तक की हालत नहीं रही है? एक दवा से अगर रोग काबू में नहीं आता तो क्या दूसरी दवा नहीं करनी चाहिए? क्या वैद्य को नहीं बदलना चाहिए? आज तक आपने जो मंदिरों में कई मीलों तक पैदल चलकर चक्कर लगाए, वे काम नहीं आए हैं और न ही आपके व्रत आपकी जिंदगी भर की
खस्ताहाली भुखमरी को हटा पाए हैं।
इन हालात को बदलने का, अपने उद्धार का केवल एक उपाय अब आपके पास है और वह है राजनीति, कानून बनाने की शक्ति! आपको भरपेट खाना नहीं