66. लोगों की धर्म भीरूता का फायदा उठाने वालों से चौकस रहें - मार्च, 1933 मुंबई - Page 396

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मिलता, छोटे से घर में भीड़-भाड़ के बीच आपको जीना पड़ता है, पैसा कमाने के साधन आपको नहीं मिलते, बेकारी में दिन गुजारने पड़ते हैं, इसके क्या कारण हैं? आपका अपना भाग्य या आपका भगवान? असल में ये दोनों बातें इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आपको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा देना देश के कानून बनाने वालों का काम है। और इस सŸा के कामकाज में आगे आप भी शामिल होने वाले हैं। अपना जीवन सुखदायक बनाने के लिए योग्य कानून आपको तैयार करवा लेने चाहिएं। मान लीजिए रेलवे की चाल में आपके हर परिवार को केवल एक कमरा मिलता है, लेकिन नए कानून से आपको यहां दो-दो कमरे भी मिल सकते हैं।

अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए आपके पास पैसा नहीं है लेकिन कानूनन आपके बच्चे के पढ़ने की व्यवस्था की जा सकती है, बशर्ते उस आशय का कानून बने। आपमें से कई लोग बेकार हैं। सभी लोगों को काम दिलाना या काम नहीं हो, तब उनका खर्चा चलाना सरकार का फर्ज है। इस तरह का कानून अगर बनेगा तो बेकारी में भूखे पेट मरने की नौबत आप लोगों पर नहीं आएगी।

अमीर लोग जब बीमार होते हैं, तो इलाज करके, दवा खाकर ठीक हो जाते हैं। गरीबों की दवा वगैरेह की व्यवस्था कानून द्वारा की जा सकती है। सार-संक्षेप यही है कि फिलहाल सभी सुखों का भंडार कानून ही है। इसीलिए हम सबको कानून बनाने की शक्ति पूरी तरह सीख लेनी चाहिए। इसीलिए जाप, तपस्या, पूजन, अर्चन करने से अपना ध्यान हटा कर, राजनीति का आंचल थामने से ही आपका उद्धार होने वाला है। आज यही बात मुझे आपको बतानी थी और मैंने वह साफतौर पर आपसे कही है।

कुछ दिनों पूर्व काँग्रेस के तथा वरिष्ठ वर्ग के लोग कहा करते थे कि हमारी मांगों के अनुसार स्वराज न मिले तो हम उसे चलाने में मदद नहीं देंगे। लेकिन आज वे अलग ही भाषा बोल रहे हैं।

असहयोग कर जेल में सजा भुगत रहे काँग्रेस के एक नेता ने कल ही सरकार से माफी मांग कर अपनी मुक्ति करवा ली। अब बाहर आकर वह कह रहे हैं कि, महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन गलत है। मैं अब कभी भी असहयोग नहीं करूंगा। इससे पूर्व महात्मा गांधी के खास शिष्य श्री राजगोपालाचारी ने घोषणा की है कि नए सुधार मिलेंगे, तो काँग्रेस जहां तक संभव हो उनका स्वीकार करेगी। मराठी भाषा के ‘केसरी’ अखबार के केलकर का कहना है कि चाहे अधूरे हों, तब भी हम नए सुधारों का स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।

कहने का तात्पर्य यही है कि ये लोग अपनी पहले कही हुई भाषा या बात बदल रहे हैं। सोचने की बात यह है कि यह जो मतपरिवर्तन उनका हुआ है उसकी वजह