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दिनांक 8 अप्रैल, 1933 की रात मुंबई के क्लार्क रोड पर स्थित बी.आई.टी. चाल में वहां की चार चालों में रहने वाले बहिष्कृत समाज की ओर से एक सभा का आयोजन किया गया था। सभा के अध्यक्ष बने थे मे. सुभेदार वि. गं. सवादकर। इस सभा में दलितोद्धारक डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को मानपत्र देने का समारोह बड़े उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस समारोह में महिला और पुरुषों की भीड़ इतनी थी कि चाल का कंपाऊंड पूरी तरह भरा था और बाहर भी लोगों की भीड़ खड़ी थी। कार्यक्रम का आरंभ करने से पहले रा. धोत्रे ने अध्यक्ष के बारे में सूचना रखी जिसका रा. तांबेशास्त्री ने अनुमोदन किया और म. सवादकर ने अध्यक्ष स्थान सुशोभित किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने अपने को अध्यक्ष बनाने के लिए लोगों को धन्यवाद दिया और कहा कि डॉ़. बाबासाहेब ने अपने समाज को सामाजिक और राजनीतिक अधिकार दिला दिए हैं। इसलिए उन्हें मानपत्र देना योग्य है। लेकिन उन्हें मानपत्र देकर ही हम उनके ऋणों से मुक्त नहीं हो सकते। उन्होंने जो कार्य शुरू किया है, उसे सही तरीके से आगे ले जाना, उसे सुचारू रूप से चलाना हमारा कर्त्तव्य है। अन्य समाजों की तरह हमारे समाज में भी विघ्नसंतोषी लोग हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहना जरूरी है। (तालियां) साथ ही तहसील और जिला संघ बना कर हमें अपने संगठन खडे़ करने चाहिए, आदि।
अध्यक्षीय भाषण के बाद रा. आबाजी अनंतराव खरात ने सुनहरे फ्रेम में मढ़ा हुआ मानपत्र पढ़ कर सुनाया तथा डा़ॅ. बाबासाहेब अम्बेडकर को अध्यक्ष के हाथों अर्पण किया गया। मानपत्र के साथ उन्हें एक चांदी का पात्र भी भेंट स्वरूप दिया गया। मालाएं और गुलदस्ते अर्पण किए जाने के बाद डॉ़. बाबासाहेब अम्बेडकर भाषण करने के लिए उठ खडे़ हुए। उन्होंने कहा,
”सभाधिपति, प्रिय भगिनी और बंधुजनों,
आज यहां के लोगों ने मुझे मानपत्र देकर सम्मान करने के कार्यक्रम का आयोजन किया, इसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूं। पिछले जनवरी माह में (1932) मेरे विलायत से लौटने के बाद मुझे मानपत्र देने की जैसे मानों होड़ लगी हुई है। ये होड़ बंद करनी होगी, कम से कम उस पर अंकुश लगाना होगा, ऐसा मुझे लग रहा था, लेकिन लोगों के उत्साह के सामने मैं अपने को बेबस पाता हूं। आज का मानपत्र भी मैं इसी मनःस्थिति में स्वीकार कर रहा हूं।
* ‘जनता’ 15 अप्रैल, 1933