384 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस मानपत्र के बारे में एक बात मैं कहना चाहता हूं कि आज तक जो मानपत्र मुझे दिए गए उनमें और इस मानपत्र में फर्क है। इस मानपत्र के बारे में काफी ढिंढोरा पीटा गया। इससे पहले जो मानपत्र दिए गए थे, उनके बारे में अखबारों में हल्ला नहीं हुआ था। लेकिन इस मानपत्र को लेकर जो अंदरूनी मामले थे, वे ‘लोकमान्य’ और ‘प्रभात’ पत्र में प्रकाशित हुए थे। इसीलिए मुझे लगता है कि यह मानपत्र मुझे अलग स्थितियों में दिया जा रहा है। अभी इस ओर आते हुए हमें बताया गया कि रास्ते में सवादकर बायकाट की तख्ती लगी हुई है इसलिए हम दूसरे रास्ते से चलें। (सभा में शेम शेम की आवाज गूंज उठी।) मैंने कहा, चलिए वह तख्ती देखते हुए आगे चलते हैं। हमने वह तख्ती देख ली है। तख्ती लगाने वालों की हिम्मत नहीं हुई इसलिए उन्होंने मेरा बायकॉट नहीं किया! इन चार चालों में नेताओं का बड़ा जमावड़ा है, यह मैं जानता हूं। मुंबई में अगर किसी को नेता की खोज हो तो वे इस चौक में आएं। इन नेताओं ने कोई ना कोई वजह निकाल कर आंदोलन की राह में रोडे़ अटकाएं हैं। किसी समय इन नेताओं का कहना था कि डॉ़ अम्बेडकर महारों को छोड़ कर चमारों के करीबी हो गए हैं। महारों के साथ वे विश्वासघात कर रहे हैं। लेकिन ऐसा कहने वाले ये लोग पूरी महार जाति को गालियां देने वाले देवरुखकर जैसे चमार के साथ मिल कर षड्यंत्र करते हैं और थोड़ी-सी सफलता पाकर फूले नहीं समाते हैं।
एक बार शिवतरकर मास्टरजी ने अपने घर सहभ्ोजन करवाया। उस सहभोज में मैं खुद और कुछ अन्य महार नेता उपस्थित थे। सहभोजन की खबर के साथ आगे देवरुखकर ने एक हैंडबिल निकाला जिसमें लिखा था कि, ”शिवतरकर ने महारों के साथ खाना खाया इसलिए उन्हें बहिष्कृत किया जाए। कारण क्या था?“ शिवतरकर ने महारों के साथ भोजन किया। देवरुखकर ने पूरी महार जाति का अपमान किया था। इस तरह जिस व्यक्ति ने कई बार महारों को अपमानित किया, उनके साथ ये लोग कैसे जा मिलते हैं! इन नेताओं की एक और दलील यह है कि डॉ. अम्बेडकर कोकणस्थ हैं, वे देशस्थों से सलाह लेते हैं, कोकणस्थों से नहीं। देशस्थ और कोकणस्थ का विवाद इतना उछाला गया कि कुछ ही दिनों में मारपीट तक नौबत पहुंची। लेकिन फिर उन्हीं लोगों ने देशस्थों के साथ हाथ मिला कर 119 नेताओं की सभा का आयोजन किया। और एक बात समझ नहीं आती कि, उस सभा से सुबेदार सवादकर को कंकड़ की तरह अलग क्यों किया गया? वे तो हाड़-मांस से कोकणस्थ हैं ना? मैं कहना यही चाहता हूं कि इस विवाद की कोई जड़ नहीं और न ही इसके पीछे कोई सिद्धांत है। सैद्धांतिक विरोध चल सकता है। लेकिन सिद्धांतों के बिना विरोध किया जा रहा हो तो जाहिर है कि उसके पीछे उनका कोई स्वार्थ छिपा हो। यहां एक और सवाल यह उठता है कि सभी नेता आपस में एक क्यों नहीं हो जाते