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नगर जिले की ओर से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर और डॉ. सोलंकी साहब को मानपत्र अर्पण करने और प्रो. राव का सम्मान करने का कार्यक्रम पहले से तय तारीख 12 और 13 अप्रैल, 1933 को मुंबई के दामोदर हॉल के पीछे वाले प्रांगण में खड़े किए गए टैन्ट में बिना किसी बाधा के संपन्न हुआ।
पहले दिन सोलंकी साहब की अध्यक्षता में हुई सभा में डॉ. बाबासाहेब को मानपत्र अर्पण किया गया।
पहले आर. एच. आडांगले ने अध्यक्ष का प्रस्ताव रखा जिसका अनुमोदन किया रा. सू़. ता. रुपवते ने। फिर डॉ. सोलंकी साहब ने अध्यक्ष स्थान ग्रहण किया। अपने भाषण में सोलंकीसाहब ने कहा, डॉ. अम्बेडकर का सम्मान करना आपके और मेरे सम्मान करने जैसा ही है। उसके बाद रा. रोहम ने मानपत्र पढ़ कर सुनाया। और फिर उसे सुंदर, चांदी के चषक में डाल कर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को अर्पण किया गया। उसका स्वीकार करने के बाद डॉ. बाबासाहेब अपना भाषण देने के लिए उठ कर खडे़ हुए। उन्होंने कहा,
‘‘आज का यह कार्यक्रम नगर जिले के लोगों की ओर से आयोजित किया जा रहा है। उनके लिए मैंने कोई खास काम नहीं किया है, फिर भी उनके मेरे प्रति प्रेम के कारण ही यह समारोह हो रहा है, इसके लिए मैं उनका आभारी हूं। नगर जिला अन्य जिलों से थोड़ा पिछड़ा हुआ है। इन जिलों के सामाजिक हालात थोडे़ कठिनाई भरे हैं, यह मैं जानता हूं। इन जिलों के महारों द्वारा ईसाई धर्म स्वीकार किए जाने से यहां दो पंथ हो गए हैं। इसके बावजूद इस जिले की ओर ध्यान देना मेरे लिए अब तक संभव नहीं हो पाया, इसके बारे में मुझे दुःख है। नया बताने जैसा कुछ हुआ नहीं। लेकिन इस कुर्सी पर बैठा हूं तभी से मेरे मन में खेद की कुछ भावनाएं गूंज रही हैं। यहां इकट्ठा हुए लोगों को लगता होगा कि काश हम भी नेता होते! डॉ. अम्बेडकर का नाम अच्छे-बुरे प्रसंगों के संदर्भ में अखबारों में पढ़ने को मिलता है, उसी तरह अपने बारे में भी कुछ छपता। मेरी बड़ी बलवती इच्छा है, मेरी जगह अगर कोई आए तो मैं अपने आपको भाग्यवान समझूं। मेरे गले में हार पहनाने वाले को खुशी हुई होगी। लेकिन मेरी हालत उसके बिल्कुल विपरीत हुई है। आपने मेरी
* ‘जनता’ 22 अप्रैल, 1933