69. तुम्हें ही अपनी जिम्मेदारियों को पहचानना होगा - अप्रैल 1933 मुंबई - Page 405

388 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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दूसरा दिन

व्यक्त करें“

दिनांक 13 अप्रैल, 1933 को रात को डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में डॉ.सोलंकी साहब को मानपत्र देने का तथा प्रो. राव के सम्मान का कार्यक्रम संपन्न हुआ। पहले रा. ग. सु. दारोले ने अध्यक्ष का प्रस्ताव रखा जिसे रा. तिगोटे ने अनुमोदित किया। तालियों की गूंज में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर अध्यक्ष स्थान पर विराजमान हुए। अपने भाषण में उन्होंने कहा,

”आज की सभा का अध्यक्ष स्थान स्वीकार करने में मुझे बड़ी खुशी हो रही है। इस समय हमें मुख्य रूप से तीन काम करने हैं। पहला काम है डॉ. सोलंकी साहब को मानपत्र अर्पण करना। दूसरा है म्युनिसिपल स्कूल कमेटी के अध्यक्ष प्रो. राव को अस्पृश्य वर्ग के लिए उन्होंने जो अभिनंदनीय कार्य किया है उसके लिए उनका सम्मान करना है। और तीसरा काम है, नगर जिले में शिक्षाप्रार्थियों के लिए बोर्डिंग

खोलने के बारे में सोच-विचार करना। डॉ. सोलंकी साहब ने अस्पृश्य समाज के लिए जो कार्य किया उसे आप-हम सब जानते हैं। उसे विस्तारपूर्वक बताने की जरूरत नहीं है। लोकापवाद की, लोकनिंदा की परवाह किए बगैर लोगों के हित में उन्होंने अपनी पूरी शक्ति खर्च की है। यह बात माननी पड़ेगी कि उन्होंने विधिमंडल में या मुंबई म्युनिसिपिटी में मुझसे सौ गुना बेहतर काम किया है। अपने अन्य कामों के कारण काउंसिल में मैं अधिक समय दे नहीं सकता। इस कार्य का सारा श्रेय उनकी लगन और काम करने को जाता है।

अमीर लोग हमेशा राजनीति और समाजकार्य करते रहते हैं। बैंक में जिनका बहुत सारा पैसा होता है, वे लोग सार्वजनिक कामों में लगे रहते हैं। हर महीने वे चेक काट कर अपना खर्चा चलाते हैं। जीवन का समय वे मनोरंजन के लिए, समाजकार्य करने में बिताते हैं। अपना चरितार्थ चलाते हुए समाज कार्य करना आसान बात नहीं। मेडिकल की परीक्षा पास करने के बावजूद डॉ. सोलंकी का अपना दवाखाना नहीं है। वे 24 घंटे सार्वजनिक कार्यों में लगे रहते हैं। समाज पर यह उनका उपकार ही है।

इंग्लैंड में मजदूरों की राजनीति करने वालों को अच्छा वेतन मिला करता था। 1910 में पार्लियामेंट के सदस्यों को तनख्वाह नहीं मिलती थी। मजदूरों की संस्थाओं से तब उन्हें 400 पौंड मिला करते थे। यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। ऐसे समय में भी डॉ. सोलंकी ने अपना समाजकार्य जारी रखा।

इसलिए, केवल मानपत्र देकर उनके कार्य का गौरव संभव नहीं। उनके कार्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अन्य तरीका अपनाना होगा। बस, उनके प्रति हमारे मन में जो प्रेम है उसे व्यक्त करने के लिए हम यह मानपत्र उन्हें अर्पण कर रहे हैं।“