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कोकण पंचमहाल (राजापुर से गोवा की सीमा तक) महार समाज सेवा संघ, मुंबई के सहयोग से रविवार दिनांक 16 अप्रैल, 1933 को रात सिमेंट चाल, बोगदा की वाडी, मझगाव में एक सहभोजन का कार्यक्रम बडे़ उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस सहभोजन कार्यक्रम में अस्पृश्य वर्ग के नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर उपस्थित थे। साथ ही इस कार्यक्रम में मे. सुभेदार सवादकर, नामदेव बुवा येरलेकर, डोलस, दुधवडे, रामभाऊ सोनवणे, उपशाम, बनसोडे, रा. ग. भातनकर, सु. अ. ल. शिरावले, शि. गो. हाटे, गो. ग. वरघरकर, मे कवली बी. ए., एल. एल. बी. आदि लोग भी उपस्थित थे।
पहले रा. शि. ना. बालावलकर ने सहभोजन के उद्देश्य के बारे में बताते हुए कहा, कि कोकण के महार समाज में बेले महार, पान महार आदि जो भेद हैं, वे खत्म होने चाहिए। इस बारे में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर से उन्होंने बोलने की विनति की। श्री नामदेवबुवा येरलेकर ने कहा कि बहुत पहले कभी आपस के झगडे़ की वजह से इस तरह के भेद हो गए हों शायद। हम सब एक ही भगवान की संतानें हैं। इसलिए इन भेदभावों को खत्म करना जरूरी है। उनके इस कथन को रा. ग. धु. जाधव, क. का.ड. पोइपकर, ल. सो. अस्वेकर ने समर्थन किया।
बाद में तालियों की भरपूर गड़गड़ाहट के बीच डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर बोलने के लिए उठ खडे़ हुए। उन्होंने कहा,
”प्रिय भाइयों और बहनों,
आज मुझे कुछ बहुत महत्वपूर्ण काम करने थे। दो-चार दिनों के बाद मुझे विलायत जाना है इसलिए मुझे कुछ बेहद जरूरी काम करने हैं। लेकिन मेरी नजर में आज का समारोह काफी महत्त्वपूर्ण है, इसलिए मैं इस सहभोज में आया हूं। जातिभेद हटाए बगैर अपनी उन्नति का मार्ग नहीं खुलेगा। मुसलमान समाज की तरह ही महार समाज भी जातिभेद नहीं मानता। महार समाज की यह बहुत अच्छी बात है। किसी भी प्रांत के महार एक साथ खाना खा सकते हैं। मैं मुंबई के सभी इलाकों में घूमता हूं। मैंने भी यही देखा कि महार समाज में जातिभेद नहीं है। केवल कोकण
* जनता : 22 अप्रैल, 1933