390 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के कुछ जगहों पर महारों में बेले और पान जैसे भेद हैं। वहां ये भेद क्योंकर बने, पता नहीं। इन भेदों को आगे क्यों जारी रखा जाए यह भी कोई बता नहीं सकता। ऐसा अगर हो तो फिर बेले और पान में भोजन या विवाह क्यों न हों? गौर कीजिए कि, दादा-परदादा के जमाने से चली आ रही यह रीत है, ऐसा कोई कह सकता है लेकिन अगर पुराने रीति-रिवाजों के अनुसार ही चलना हो तो हमें भी उन्हीं की तरह परेशानियां झेलते रहना पडे़गा। उनके समय स्थितियां अलग थीं। उन्हें पूरी तरह अज्ञान में रखा गया था। वे गुलामी की हालत में जी रहे थे। उनके पास न तो राजनीतिक ताकत थी न धार्मिक। उनकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। उनकी गलतियों के कारण ही आज हमें दुःख भोगना पड़ रहा है। यह दुख दूर होकर अपने बाल-बच्चों को सुख मिले ऐसी अगर आपकी कामना हो तो बाप-दादाओं की गलतियों को हमें सुधारना होगा।
इस बारे में बुजुर्गों से ज्यादा जिम्मेदारी युवाओं पर है। मुझे पूरा यकीन है कि वे अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाएंगे। आपस के इसी मतभेद के कारण आज तक रत्नागिरी में बोर्डिंग नहीं खोला जा सका है। सार्वजनिक आंदोलनों का भी यही अनुभव रहा है। मान लीजिए, किसी गांव में बेले महार और पान महार दोनों उपजातियों के लोग रहते हों और उनमें से एक ने मृत मांस खाना छोड़ दिया और दूसरा वह खाने के लिए तैयार हो जाए, तो दोनों पर गांव के लोगों का वर्चस्व बढ़ जाएगा। लेकिन अगर उनमें भेदभाव न हो तो इस तरह का बुरा असर नहीं होगा। अपनी प्रगति के लिए हमें जातिभेद का त्याग करना होगा।
अपने बीच भेदभाव की जो गंदगी है, उसे हटाने के बाद ही हम औरों को उसे हटाने की सीख दे सकेंगे।
मुझे खुशी है कि हमारे लोगों में इस दिशा में बड़ी जोरों से कोशिशें शुरू हो गई हैं। मुझे विश्वास है कि कुछ ही दिनों में हमारे बीच के ये भेदभाव नष्ट होंगे। आज के इस कार्यक्रम के लिए मैं सबका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं।