71. कूपमंडूक मानसिकता को त्याग कर सार्वजनिक कार्यों के लिए चंदा दें - अप्रैल 1933 कुर्ला (मुंबई) - Page 408

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कूपमंडूक मानसिकता को त्याग कर सार्वजनिक कार्यों के लिए

चंदा दें

दिनांक 22 अप्रैल, 1933 को रात 9.30 बजे रावबहादुर एस. के. बोले, एम. एल. सी., जे. पी. मुंबई की अध्यक्षता में कुर्ला की जी. आई. पी. रेलवे पोर्टर चाल में कुर्ला के अस्पृश्य समाज की ओर से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को मानपत्र और 80 रुपयों की थैली अर्पण की गई। पहले तय किया गया था कि डॉ. बाबासाहेब यहां पहुंचेंगे तब कुर्ला स्टेशन से डॉ. अम्बेडकर रोड, जुम्मा मस्जिद रोड, शिवाजी रोड इन रास्तों से जुलूस निकाला जाएगा और उसके लिए कुर्ला, मुम्बई के अस्पृश्य लोगों ने पूरी तैयारी की हुई थी। लेकिन समयाभाव के कारण यह कार्यक्रम ऐन समय पर स्थगित करना पड़ा। इससे लोगों को बहुत निराशा हुई। इसके बावजूद प्रमुख कार्यक्रम बड़े उत्साह के साथ संपन्न हुआ। रीतिनुसार अध्यक्ष रावबहादुर बोले स्थानापन्न हुए तो रा. कर्डक ने मानपत्र पढ़कर सुनाया। फिर अध्यक्ष के हाथों मानपत्र और 80 रुपयों की थैली डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को भेंट की गई। उन्हें माला और गुलदस्ता भी भेंट किया किया गया। उसके बाद वे बोलने के लिए खडे़ हुए। उन्होंने कहा,

”यहां इकट्ठा लोगों के समुदाय की ओर देख कर मुझे पांच-सात वर्ष पूर्व घटित एक घटना की याद आती है। मैं दूसरी बार कुर्ला आया हूं।

पांच-सात वर्ष पूर्व यहां के लोगों ने मुझे अध्यक्ष पद का आमंत्रण दिया था। बारिश के दिन होने के बावजूद मैं समय से यहां पहुंचा था। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि सभास्थल पर कोई भी नहीं था। मुझे इस बात का बहुत आश्चर्य हुआ। मुझे लगा कि हर जगह मेरे भाषण के लिए हजारों लोग इकट्ठा होते हैं, फिर यहां कोई क्यों नहीं आया? मैंने पूछताछ की तब पता चला कि उस सभा का हैंडबिल केवल नासिक के लोगों ने ही निकाला था। उस पर नगर, सातारा आदि जिलों के लोगों के नाम नहीं थे, इसलिए ऐसा हुआ।

इस समारोह का आमंत्रण देने के लिए जब यहां के लोग आए, तब मैंने उन्हें बताया कि अगर सभी लोगों की तरफ से कार्यक्रम हो रहा हो तो मैं आऊंगा। उन्होंने मेरी बात मानी और उस पर अमल भी किया। इसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूं। सबका मिल जुल कर रहना जरूरी है। एक का दुःख सबका दुःख होना चाहिए। केवल अपने बारे में सोचने की कूपमंडूक मानसिकता को त्याग दें। आप सबके एक

* जनता : 29 अप्रैल, 1933