392 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
होने की मुझे बड़ी खुशी है। मानपत्र भेंट करके मेरा आपने जो गौरव किया है उसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
आपने थैली में जो राशि दी है, उसे मैं अपने घर के काम में नहीं लगाऊंगा। इससे पहले भी मुझे बहुत धन मिला है। उसमें से भी मैंने अपने लिए एक पैसा तक नहीं लिया है। सब पैसा मैंने सार्वजनिक कामों में लगाया है। आपने आज जो पैसा दिया है उसे भी मैं सार्वजनिक कामों के लिए ही दूंगा। यहां करीब पांच-छह हजार लोग इकट्ठा हैं। इतने बडे़ जमावड़े से सार्वजनिक कार्य के लिए केवल 80 रुपये ही इकट्ठा किए जा सकते हैं, यह बड़ी शर्मिंदगी की बात है। अब इसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता है लेकिन आगे कभी इस बात की भरपाई होगी, ऐसी उम्मीद मैं रखता हूं। सार्वजनिक काम पैसों के बगैर नहीं हो सकते। काम करने वाले को वेतन देना जरूरी है। कुछ लोग सार्वजनिक काम मुफ्त में करते हैं। लेकिन सभी लोगों का मुफ्त काम करना संभव नहीं है। अपने ‘जनता’ अखबार में 5-6 लोग लिखने का काम करते हैं। और जगहों पर ऐसे कामों के लिए हर माह 100-200 रुपए देने पड़ते हैं। लेकिन पिछले पांच-सात सालों से ये लोग बिना पैसा लिए मुफ्त में अग्रलेख वगैरा लिखकर देते हैं। यही बात भारत भूषण प्रेस की भी है। इस छापेखाने में प्रबंधक आदि जो लोग हैं, उन्हें कम से कम वेतन दिया जाता है। ये लोग स्वार्थ त्याग करने वाले इन्सान हैं, इसलिए कार्य ठीक चल रहा है। किन्तु, हमेशा इसी तरह कार्य सुचारू रूप से चल पाना असंभव है और इसीलिए आप लोगों को पैसा देकर सहायता करनी चाहिए।“