72. अंग्रेज सरकार इस देश में कुछ नहीं करती है - अप्रैल 1933 (मुंबई) - Page 410

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अंग्रेज सरकार इस देश में कुछ नहीं करती है *

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अंग्रेज सरकार इस देश में कुछ नहीं करती है

पूर्वघोषित के अनुसार बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को पुणे जिला, नासिक जिला तथा अन्य जगहों के लोगों की तरफ से मानपत्र और थैलियां अर्पण करने का संयुक्त कार्यक्रम हाल ही में शाही अंदाज में संपन्न हुआ। 23 अप्रैल, 1933 को रात 9 बजे मुंबई के दामोदर हॉल के पीछे जो बड़ा-सा मैदान है उसमें बड़ा मंडप

खड़ा किया गया था। उसमें मंच खड़ा किया था, कोच और कुर्सियां लगाई थीं। देखने वालों को यह सब किसी राजा के दरबार सा लग रहा था। इस समारोह के लिए बाहर से भी कई लोग आए हुए थे। कुल 8-10 हजार का जनसमुदाय था। मंच पर ऊंची जगह बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर, अध्यक्ष रावबहादुर बोले और डॉ. सोलंकी बैठे थे। उनके इर्दगिर्द कोच पर श्री सहस्त्रबुद्धे, देवराव नाईक, भाई प्रधान, डॉ. प्रधान, श्रीमती सरलाबाई प्रधान, प्रो. कंगले, श्रीमती गीताबाई कंगले, असवेकर कवली, खांडके, भाई चित्रे, कमलाकांत चित्रे, रणखांबे, भाऊ गायकवाड़, दाणी, काले, जाधव आदि लोग थे। माहीम चाल, नायगाव, रेतीचा धक्का, डिलाइल रोड, सैतान चौकी, फŸारबंदर, करी रोड, वाडिया हॉस्पिटल, सैंडहर्स्ट रोड, कोली वाडा, क्लार्क रोड, आर्थर रोड, वडाला, शिव, माटुंगा आदि जगहों के 500 से अधिक समता सैनिक दल के लाठीबंद सैनिक इस समारोह का प्रबंधन देखने के लिए समारोह के इर्द-गिर्द दीवार बना कर तैयार खड़े थे। पहले रा. दिवाकर नेवजी पगारे ने अध्यक्ष की सूचना रखी जिसका समर्थन राजमान्य शंकरराव लिंबाजी ओझरकर ने किया। तब अध्यक्ष रावबहादुर एस.के. ने अध्यक्ष स्थान ग्रहण किया। उन्होंने अपने भाषण में कहा, यहां इकट्ठा हुए जनसमूह से इस बात का पता चलता है कि आप लोगों में कितनी जागृति हुई है। आपको गहरी नींद से जगाने का श्रेय डॉ. अम्बेडकर को जाता है।

यह हमारे समाज का भाग्य है कि डॉ. अम्बेडकर हमारे समाज में पैदा हुए। वे पूरी दुनिया के नेता बनने के काबिल हैं। उनकी लाइब्रेरी देखने पर इस बात का पता चलता है कि उन्होंने कितनी पढ़ाई की है और वे कितना पढ़ते हैं। गोलमेज सम्मेलन के समय राजनीति जानने के लिए उन्होंने राज्य के संविधान की किताबें अपने पैसे से खरीद कर पढ़ी हैं। कुछ लोग कहते हैं कि उनकी सोच जाति केंद्रित है, लेकिन यह बात गलत है। साइमन कमीशन को रिपोर्ट देते हुए यह बात स्पष्ट हो चुकी है। उस समय राष्ट्रीय विचारधारा वाले कई लोगों ने उनकी प्रशंसा भी की।

* जनता : 29 अप्रैल, 1933