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और अस्पृश्य समाज के वे खुद प्रतिनिधि हैं और वे उनका हित-अहित अच्छी तरह जानते हैं। उनका कहना था कि डॉ़ अम्बेडकर के पीछे अस्पृश्य समाज बिल्कुल नहीं है और जो मत वह व्यक्त कर रहे हैं वे खुद उनके मत हैं। उनका अस्पृश्य वर्ग से कोई ताल्लुक नहीं है। उनके इस कथन को हिंदुस्तान में बड़ा समर्थन मिल रहा था। काँग्रेस और हिंदू महासभा के कार्यकŸार्ओं की ओर से अस्पृश्यों में फूट डालने की कोशिशें की जा रही थीं। उन्हीं की वजह से चमारों की कुछ उपजातियां उस वक्त मेरे खिलाफ हो गई थीं। उस समय झूठी सभाओं, झूठे तार आदि की मानों बारिश ही हो रही थी। उसी समय अन्य चमार जातियों की ओर से हो रहा विरोध गलत है यह, श्री वनमाली और चांदोरकर जी के ध्यान में आया। मेरा विरोध करने में चमार समाज का हित नहीं है यह वे जानते थे। इस बात को जान कर उस समय कई तार मेरे पास आए थे, उनमें चेवली चमार समाज की ओर से श्री वनमाली, चांदोरकर का भी एक तार आया था और मैं यह कभी नहीं भूल सकता।
दूसरे गोलमेज सम्मेलन के बाद अल्पसंख्यकों का निर्णय जल्द ही सरकार ने जाहिर किया। उसमें अस्पृश्यों को पृथक मतदाता केंद्र देकर स्वराज्य में अस्पृश्यों की आजादी को मान्यता दी गई थी। सरकारी निर्णय प्रसिद्ध होने के बाद प्रतिज्ञा के अनुसार गांधी को प्राणांत प्रायोपवेशन शुरू करना पड़ा। उसी में पूणे करार का जन्म हुआ। उस करार के जरिए हमें जो राजनीतिक महत्त्व और हक मिले हैं उनका पालन करना अब आप लोगों के हाथ में है। अपनी जाति के नेता की बात मानना, उनके आदेशानुसार चलना हिंदू धर्मियों का गुण है। इसलिए, आप अपनी जाति के नेताओं का विश्वास करें। मुझे नहीं लगता कि हिंदू लोग या उनके युवा या नेता आपके लिए कुछ करेंगे। यह आशा करना बेकार है कि वे आपको मंदिरों में ले जाएंगे, अपने तालाबों का पानी पिलाएंगे। जो लोग सनातनियों की मर्जी रख कर अस्पृश्यों के उद्धार का काम कर रहे हैं उनकी नजर अभी हिंदुस्तान के भूगोल पर नहीं गई है। वे अगर थोड़ी नजर डालें तो उनको पता चलेगा कि उनकी नजर श्अटकेपारश् (सीमापार) है या विंध्याद्री पर। मुझे हिंदू धर्म या समाज की परवाह नहीं है। मैं बस जिनसे मेरा नाता है उस अस्पृश्य समाज का हित देखना चाहता हूं। उसी हित को साधने की कोशिश में मैं लगा हुआ हूं। आपसे मेरा बस इतना ही कहना है कि धर्म को सामाजिक बातों से दूर रखिए। अपनी अकल को रोटी, शिक्षा और राजनीतिक सŸा पाने की तरफ लगाइए। अभी यहीं पर सार्वजनिक कुओं, विद्यालयों आदि पर नामपट्ट लगाने का प्रस्ताव रखा था। याचना करने की जरूरत ही नहीं है। महापालिका और लोकल बोर्ड में अगर आपके सच्चे और काफी प्रतिनिधि हों तो वे खुद संघर्ष कर, लड़ाई कर ऐसा करने के लिए मजबूर करेंगे। इसीलिए, इस तरह के प्रतिनिधि तैयार करने और उन्हें चुनाव में जिताने की ओर ध्यान दें। महात्मा