5. घनघोर संग्राम करने पर ही मनुष्यता वापिस मिलेगी - 11 अप्रैल, 1925 निपाणी (बेलगांव जिले) - Page 42

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राजनीतिक समस्याएं दो नहीं एक ही है इसलिए वे हमेशा कहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता निवारण इन दोनों के बिना स्वराज नहीं मिलेगा। सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो कहना पड़ता है कि जिस तरह कस्तूरबा गांधी और लक्ष्मी में सौतेलेपन का भाव है उसी तरह गांधीजी अस्पृश्यता के बारे में सौतेलेपन का व्यवहार करते हैं ऐसा कहना पडे़गा। क्योंकि जितना जोर वे खादी प्रसार और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए देते हैं उतना अस्पृश्यता निवारण पर नहीं देते। यदि उन्होंने उतना ही बल दिया होता तो जिस तरह काँंग्रेस में उन्होंने यह जि़द की है कि सूत के बिना मताधिकार नहीं उसी तरह वे यह भी आग्रह करते कि अस्पृश्यता निवारण के बगैर काँग्रेस में प्रवेश नहीं मिलेगा। खैर! जब कोई पास बिठाने को राजनीति महात्मा गांधी द्वारा दिखाई गई सहानुभूति कुछ कम नहीं है। अपनी सहानुभूति के कारण वे वैकम गए थे और उन्होंने वहां के ब्राह्मणों के सामने समझौते के तीन सूत्र रखे। उन्होंने कहा कि, ़1. जनता से राय लें; 2. जिन शास्त्रों में अस्पृश्यता बताई गई है। पंडितों के द्ारा यह तय करवा दें कि जिन शास्त्रों में अस्पृश्यता बताई गई है वह सच्ची है या झूठी; 3. त्रावणकोर के दीवान को अध्यक्ष बना कर पंडितों की समिति के द्वारा समस्या का समाधान निकालें। लेकिन खेद और आश्चर्य की बात यह है कि ये तीनों ही रास्ते ब्राह्मणों को स्वीकार्य नहीं थे। वे अस्पृश्यों को रोकने के अपने निश्चय से डिगे नहीं। इतना ही नहीं तो अस्पृश्यता को अन्याय मानने वाले गांधीजी के सामने कोई शास्त्र रख दिया।

मैंने इन हिंदू शास्त्रों को पढ़ा नहीं है और मुझे पता नहीं कि उनके पेट में कौन कौन-सी पहेलियां छिपी हुई हैं। मेरा विश्वास है कि उन शास्त्रों में अस्पृश्यता का उल्लेख है। लेकिन मुझे लगता नहीं था कि हमारे धर्माचार्य छाती ठोंक कर यह कहेंगे कि व्यावहारिक जीवन में अस्पृश्यता का पालन धर्म है। इसका सीधा अर्थ यह है कि हम सारे शास्त्रों को जला कर राख कर दें या शास्त्रों को छान कर अस्पृश्यता के बारे में उनके जो फैसले हैं, उन्हें गलत साबित करते रहें और यदि उन फैसलों को हम गलत साबित नहीं कर सकें तो हमें शुरू से आखिर तक अस्पृश्यता झेलनी पडे़गी। अगर यही हमारे धार्मिक नेताओं का दुराग्रह है तो हमें एकदम अलग ढंग से इन शास्त्रों को ठिकाने लगाना पडे़गा। इग्लैंड में बर्कले नाम का बहुत बड़ा दार्शनिक हुआ था वह कई तरह की दार्शनिक पहेलियां रच के लोगों को परेशान करता था और लोग उसकी पहेलियों से बहुत परेशान हो गए थे। ऐसे ही एक दुखी व्यक्ति डॉ जॉन्सन की मदद लेने उनके पास गया और बर्कले की एक पहेली बता कर उसे बूझने की प्रार्थना करने लगा। कुछ समय बाद डॉ जॉनसन ने पास ही पडे़ एक पत्थर पर उस कागज को रख कर उसे ठोकर मारी और कहा, ये देखो, इस तरह से मैंने उसकी पहेली को आसानी से हल कर दिया। यही न्याय हमें इन