5. घनघोर संग्राम करने पर ही मनुष्यता वापिस मिलेगी - 11 अप्रैल, 1925 निपाणी (बेलगांव जिले) - Page 43

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नीच शास्त्रों के साथ भी करना उचित होगा। सचमुच ही ये शास्त्र सारी जनता का अपमान करने वाले हैं। सरकार को इन्हें पहले जब्त कर लेना चाहिए था। कम से कम उसका जाप करने वालों को सामाजिक समस्या का समाधान करते समय उन्हें बीच में नहीं लाना चाहिए। वरना, स्थिति भयावह होने का खतरा होता है। सभी में बराबरी का रिश्ता बनाकर एक दूसरे की मदद करना और समाज में सद्भाव बना रहे इस तरह व्यवहार करना यही समाज रचना का मुख्य उद्देश्य है। जब यह दिखाई दे कि समाज के कुछ लोग प्रबल होकर दूसरों पर जुल्म करने लगे हैं और समाज रचना का उद्देश्य ही सफल नहीं हो रहा है उस समय वही हाथ पर हाथ धरे चुपचाप बैठे रहने के बजाय बाकी सारे काम छोड़कर ऐसे मदांध लोगों की चोटी पकड़कर उन्हें झुकाना ही समाज के हर व्यक्ति का कर्तव्य होता है। हम यह मांग नहीं कर रहे कि सभी लोगों को हर तरह से बराबर रखने के लिए सभी को संघर्ष करना चाहिए। जिस तरह छोटे दूल्हे और बड़ी दुल्हन की जोड़ी जमने पर दुल्हन के जवान होने पर दूल्हे की फजीहत न हो इसलिए दुल्हन को नमक खिलाना बंद करने का सुझाव दिया जाता है। हम उनकी तरह यह नहीं सुझा रहे है कि हम गरीब हैं इसलिए दूसरों का पैसा छीनकर उन्हें भी गरीब बनाया जाए। हम हमारी मानव जाति को हासिल समान अधिकार मांग रहे हैं लेकिन उनके मिलने में शास्त्र बाधक बन रहे हैं। जहां-जहां इन अधिकारों को छीना गया वहां-वहां बड़े संघर्ष हुए हैं। फ्रांस में उच्च वर्ग के लोगों द्वारा अत्याचार किए जाने के कारण निम्न वर्ग के लोगों ने उनका कत्लेआम किया। अमेरिका में नीग्रो लोगों को गुलामी से मुक्त करने के लिए छह वर्ष तक गृहयुद्ध हुआ। यह सही है कि गृहयुद्ध में बड़ी संख्या में लोग मारे गए मगर उनकी मौत बेकार नहीं गई। उन्होंने जीवित रहे लोगों के जीवन को सुखद बनाया। क्या ऐसा घनघोर युद्ध करने पर ही हमारी छीनी गई मनुष्यता हमें वापस मिलेगी? या किसी सौम्य उपाय से काम चल जाएगा। अभी इस सवाल को छोड़ दे तो भी हमें एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि हम पर इतना अन्याय, इतनी उपेक्षा और जबरदस्ती होने के बावजूद हम गूंगे की तरह चुप हैं और गाय की तरह सहनशील हैं। हमें उसका कोई दुख नहीं, आक्रोश नहीं, अहसास नहीं। आश्चर्य केवल इस बात का है। छोटी-सी चींटी पर पांव पड़ने पर वह डसती है। लेकिन हम इतने बड़े प्राणी होने पर भी कोई हमें लातें मारे तो भी हम पलटकर उसे जवाब नहीं देते। खोजने पर इसके दो ही कारण दिखाई देते हैं। एक हमारे पास ज्ञान और बुद्धिमानी नहीं है। यह जिनके पास थी उन्होंने उसके बल पर हमारे लोगों पर जुल्म किए और हमारी सलाह के बगैर यह तय किया कि हमें फलां-फलां नियमों के अनुसार व्यवहार करना है। ऐसा व्यवहार करने के लिए अन्यायपूर्वक जबरदस्ती की गई। यह सब हम अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने का फल भोग रहे हैं। और हमने ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। यदि हमारे मनुष्यतारूपी धन का हरण