| fd | r | u |
|---|
| r | d | Col3 |
|---|
| d | k |
|---|
| v | i | e | ku |
|---|
| l | gsa| |
|---|
75
कितने दिनों तक गुलामी का अपमान सहें?
शनिवार दिनांक 29 सितंबर, 1934 की रात मुंबई के परेल इलाके के पोयबावड़ी के कामगार मैदान पर पुणे समझौते की स्मृति को कायम रखने के लिए एक प्रचंड सार्वजनिक सभा आयोजित की गई थी। अस्पृश्यों में गिने गए समाज के दस हजार से भी ज्यादा लोग इस सभा के लिए उपस्थित थे। उस समय अध्यक्ष के नाते डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का लोगों को सोचने पर मजबूर करने वाला और समाज में नई चेतना का निर्माण करने वाला भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में कहा,
‘‘पिछले लगभग दो हजार सालों से कभी अस्पृश्य समाज को देश के समाज का अभिन्न हिस्सा नहीं माना गया। कोई राजनीतिक या सामाजिक कार्य उपस्थित हो तो उस कार्य के बारे में सोचने का मौका अस्पृश्य समाज को कभी नहीं मिला। महाराष्ट्र की राजनीतिक घटनाओं को देखा जाए तो ध्यान में आएगा कि ब्राह्मण, कायस्थ, मराठा आदि जातियों को ही इन बातों के बारे में सोचने का ठेका दिया गया था।
इस काम में महार का योगदान सिर्फ सूचना देने भर तक ही सीमित था। यानी कि जासूसी से अधिक उनकी कोई भूमिका नहीं थी। अन्य जातियों को आमंत्रण पहुंचाने के बाद बहुत हुआ तो वे दरवाजे के बाहर बैठ कर अंतर्गृह में चल रही घटनाओं का अंदाजा ले सकते थे। अंदर किन बातों पर सोच-विचार चल रहा है इसके बारे में उन्हें जानकारी भी नहीं हुआ करती थी।
अस्पृश्य समाज की भी अन्य मानवप्राणियों की तरह ही जरूरतें हैं, उनके पास भी मन है, अन्य मानवों की तरह ही दुःख-सुख उन्हें भी महसूस होता है यह खयाल कभी स्पृश्य समाज को आया ही नहीं। इस कारण अस्पृश्य समाज को देश के सामाजिक हो या राजनीतिक क्रियाकलापों में हिस्सा लेने का मौका ही नहीं मिला। धरती के किसी भी देश में दिखाई न देने वाली इस विपरीत पद्धति ने हिंदुस्तान में कई शतकों से जडे़ं जमा रखी थीं। इस दौरान समाजशास्त्रियों ने, शासकों ने और तत्त्वज्ञों ने इस समाज को विनाश की तरफ ले जाने वाली विचारधारा पर अंकुश लगाते हुए उसे नया मोड़ देने की कभी भी कोशिश नहीं की। इसका अस्पृश्य समाज पर बुरा असर हुआ और उनका जीवन कष्टकर, स्वाभिमानशून्य और हतबल तो हुआ ही लेकिन उसका बुरा असर पूरे देश को, खासकर हिंदू समाज को भुगतना पड़ा
* ‘जनता’ 20 अक्तूबर, 1934