404 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। लेकिन अब जमाना बदल चुका है। 1930 के साल में अस्पृश्य नेता को गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए हिंदुस्तान के राज्यकर्ताओं ने आमंत्रित किया। मेरे मतानुसार, तभी से इस युग के बदलाव का समय शुरू हुआ। पूर्वकालीन हिंदू समाज के जमाने में जो नहीं घटा था, मुगलकाल में जो नहीं घटा था, मराठों के हिंदवी स्वराज में नहीं घटा था, वह बीसवीं शती में घटा है।
हिंदुस्तान की आगामी राज्य व्यवस्था के बारे में विभिन्न समाजों के साथ सोच-विचार करते हुए राज्यकर्ताओं को लगा कि अस्पृश्य समाज को दूर रखना यानी उस बारे में सभी विचारों को दूर रखने जैसा था। साथ ही, उन्हें लगा विचार-विमर्श से लिए जाने वाले निर्णयों में अगर अस्पृश्य समाज के मतों को, उनकी आकांक्षाओं को भी शामिल नहीं किया गया, तो वे निर्णय अधूरे रह जाएंगे। इतना ही नहीं, अंग्रेज राज्यकर्ताओं को इस बात का अहसास हो चुका था कि इस तरह खड़ी की जाने वाली शासन व्यवस्था को कभी असल लोकतंत्र का स्वरूप प्राप्त नहीं हो सकता। और इसीलिए उन्होंने अस्पृश्यों के प्रतिनिधि को गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। इस आमंत्रण से अस्पृश्यों के प्रतिनिधि को अब तक के इतिहास में अस्पृश्यों को अप्राप्त समानता, तथा उच्च माने जाने वाले अन्य वर्गों के समान सम्मान प्राप्त हुआ। देश के हितसंबंधों के साथ अस्पृश्य वर्ग के हितसंबंधों के जुडे़ होने का तथा उनके हकों की रक्षा किए बगैर देश की प्रगति होना असंभव है, इस बात का अहसास पूरे हिंदू समाज को हुआ। अस्पृश्यों के प्रतिनिधि को अन्यों के साथ देश का भविष्य गढ़ने का मौका मिला। इसी बदले हुए समय की नीव मजबूत करने के इरादे से आपके प्रतिनिधियों ने भविष्यतकाल के अपने उज्जवल इतिहास का प्रारंभ किया। इस तरह की शुरुआत करना उनके लिए आसान नहीं था। अपने समाज के अधिकारों को स्थापित करने के लिए उन्हें बाकी लोगों के साथ संघर्श करना पड़ा।
दूसरे गोलमेज सम्मेलन से पूर्व जातियों की आपसी लड़ाइयों से सब तंग आ चुके थे, हताश हो गए थे। हम सब महात्मा गांधी के आगमन का इंतजार कर रहे थे। गांधीजी को पक्षातीत माना जाता था इसलिए सबको उम्मीद थी कि वे इस झगड़े का निपटारा करेंगे। खुद मुझे भी उम्मीद थी कि अस्पृश्यों के न्यायिक अधिकारों का स्वीकार कर उन्हें राजनीति में योग्य अवसर दिए जाएंगे। फर्क बस इतना होगा कि किसी को एक पŸाल मिलेगी, तो किसी को दो, मगर मेरे समाज के हिस्से में कम से कम एक दोना, कटोरी तो अवश्य आएगी, ऐसी मुझे उम्मीद थी, लेकिन मेरी उम्मीद झूठी साबित हुई।
महात्मा गांधी ने जब मुझे सीधे-सपाट शब्दों में बताया, ‘मुसलमानों को जो चाहिए वह मैं उन्हें दूंगा, ईसाइयों को जो चाहिए मैं उन्हें दूंगा, यूरोपियन, एंग्लो इंडियनों