75. कितने दिनों तक गुलामी का अपमान सहें? - सितंबर 1934 परेल (मुंबई) - Page 422

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के हक भी मैं मान लूंगा, सिक्खों की मांगें मानी जाएंगी, लेकिन अस्पृश्यों का तिनके बराबर का हक भी मैं नहीं मानूंगा’, तब मैं भौंचक रह गया। महात्मा गांधी के जैसे बर्ताव का उदाहरण मुझे पूरे इतिहास में दिखाई नहीं देता। लेकिन महाभारत के एक प्रमुख प्रसंग की याद आए बगैर नहीं रहती। कौरव-पांडवों का झगड़ा न बढे़, जहां तक हो सके आपसी सौहार्द के साथ मामला निपट जाए, खूनखराबा न हो इसके लिए श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से बातचीत की थी, यह हम सब जानते हैं। उस समय दुर्योधन ने साफ-साफ कहा था कि पांच पांडवों को आधा राज्य तो दूर की बात है, मैं पांच गांव तक नहीं दूंगा। उसी तरह का जवाब मुझे भी दिया गया। उसके बाद क्या हुआ आप सब जानते हैं।

अस्पृश्य समाज के न्यायपूर्ण हकों की मांग को अंग्रेज सरकार मान गई थी और उन मांगों के आधार से जातिगत निर्णय लेने की प्रक्रिया में उन्होंने अस्पृश्यों को शामिल किया था। इस निर्णय के सार्वजनिक होने के बाद अपने पापों को धो देने किए या कहिए कि मन की ग्लानि को मिटाने के लिए कहिए या फिर अपने हाथों हुए अन्याय के परिमार्जन के लिए कहिए महात्मा गांधी ने प्राणांतिक उपोषण किया और सब जानते हैं कि उस उपोषण का अंत पुणे करार में हुआ। उसी अनुबंध की स्मृति को ताजा करने के लिए हम सब आज यहां इकट्ठा हुए हैं।

इस समझौते के भविष्य के बारे में आज कुछ लोगों ने जो डर व्यक्त किया है, वह निराधार है। उन्हें शक है कि जातिसंबंधी निर्णयों पर कई तरफा आघात होने के कारण सरकार अगर उसे रद्द करेगी तो हो सकता है पुणे अनुबंध को लागू करने में बाधाएं आएं। मैं फिर से जोर देकर कहता हूं कि इस तरह का डर या आशंका बिल्कुल निराधार है। पुणे करार में डरने जैसी कोई बात नहीं है। राष्ट्रीय सभा ने घोषित किया है कि ‘वाइट पेपर’ को इनकार कर अगर उसे, जला दिया जाता है तो जाति संबंधी लिए गए निर्णय अपने आप नष्ट होंगे। हमें इस विवाद में जाने की जरूरत नहीं है। आपको इस बात से डर लग रहा है कि जातीय निर्णय अगर रद्द होते हैं तो पुणे करार भी नष्ट होगा? तार्किक नजरिए से या कानून के नजरिए से इस तरह के डर का शिकार होने की कोई जरूरत नहीं है। क्यों, यह मैं आपको बताता हूं। अंग्रेज सरकार के कम्युनल अवार्ड के पांचवें अनुच्छेद में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है कि ‘जातियों के बीच जो विवाद थे उनका आपसी सामंजस्य से निपटारा न होने के कारण सरकार को यह निर्णय देना पड़ रहा है।’ यानी कि, अगर यह विवाद आपस में सुलझ जाता तो सरकार को कम्युनल अवार्ड की जरूरत नहीं पड़ती। और, अगर भविष्य में कभी हिंदुस्तान में जातियों के बीच आपसी सामंजस्य के बाद सुलह हो जाए तो सरकार उनके द्वारा लिए गए निर्णय को जरूर स्वीकार