75. कितने दिनों तक गुलामी का अपमान सहें? - सितंबर 1934 परेल (मुंबई) - Page 423

406 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लेगी। पुणे करार इसी तरह का समझौता है और इस समझौते को सरकार ने मान्यता दी है। कम्युनल अवार्ड में केवल प्रांतीय काउंसिलों की जगहों के बंटवारे के बारे में बताया गया है। उसमें वरिष्ठ विधि काउंसिल की जगहों का जिक्र नहीं है। पुणे समझौते में इन दोनों ही काउंसिलों की जगहों का बंटवारा हुआ है और जब सरकार ने पुणे समझौते को मान्यता प्रदान की उसी समय सरकार ने कम्युनल अवार्ड (जाति पर आधारित फैसला) की प्रांतीय काउंसिलों की सीटों के विभाजन की जगह पुणे करार के प्रांतीय सीटों के बंटवारे को सही माना तथा वरिष्ठ विधि काउंसिल के बारे में पुणे समझौते में शामिल की गई बातों को स्वीकार किया। और उसी सिद्धांत के अनुसार बाद में ‘वाइट पेपर’ में पुणे समझौते में दी गई वरिष्ठ काउंसिल की सीटों के बंटवारे की संख्या तय की गई। यानी पुणे समझौते में हिंदू और अस्पृश्यों में हुए सामंजस्य के सिद्धांत को सरकार ने कम्युनल अवार्ड की पांचवी धारा के तहत मान्यता दी और उस पर अपनी मुहर लगाई। इस समझौते में सरकार या हिंदू कोई परिवर्तन करना चाहें तो वह ऐसा नहीं कर सकते। यह परिवर्तन हिंदू और अस्पृश्यों के बीच आपसी चर्चा से ही किया जा सकता है। अन्य किसी भी तरीके से परिवर्तन नहीं हो सकता, और इसलिए आपको निःशंक रहने में कोई हर्ज नहीं है।

अब हिंदुओं की तरफ से शायद बताया जाए कि जब दो पार्टियों के बीच अनुबंध किया जाता है, तब उनमें से कोई भी पार्टी संकट में नहीं होनी चाहिए। महात्मा गांधीजी ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी और इसीलिए उनके प्राण बचाने की जिम्मेदारी मुझ पर आन पड़ी। उस दौरान पूरा हिंदू समाज मुझ पर भड़क उठा था। चारों तरफ से मुझे घेरा जा रहा था कि मैं किसी तरह झुक जाऊं और समझौता करवा दूं। देश के कई युवा मुझे जान से मारने के लिए तैयार हुए थे। बंगाल के अत्याचारी युवकों से मुझे धमकी भरे खत मिल रहे थे। मुझे जताया जा रहा था कि किसी भी तरह से अगर महात्मा गांधी के प्राणों पर संकट आएगा, तो मुझे जिम्मेदार ठहराया जाएगा और इतना ही नहीं, इसके लिए पूरे अस्पृश्य समाज को भी जिम्मेदार ठहराकर हिंदुओं की तरफ से बदला लिया जाएगा। मेरी आंखों के सामने इस तरह की भीषण तस्वीर साफ थी। ऐसे हालात में प्रतिपक्ष के साथ लेन-देन करते हुए मुझे समझौते पर हस्ताक्षर करने पडे़। ऐसे हालात में अपने प्राण संकट में होने के कारण समझौते पर हस्ताक्षर करने पडे़ यह कहने का हक अगर कानूनन किसी को है, तो वह केवल मुझे है इसमें कोई शक नहीं।

पुणे अनुबंध की सभी बातें भले ही मेरे मतानुसार नहीं तय हुई हों लेकिन इस तरह का हक बजा लाने के लिए मैं तैयार नहीं हूं। पुणे समझौते के बारे में मैं ईमानदार रहना चाहता हूं। इस तरह पूरा अस्पृश्य समाज पुणे करार का पालन करने के लिए तैयार है लेकिन हिंदुओं के बारे में मैं यह यकीन के साथ नहीं कह पाऊंगा। हिंदू