75. कितने दिनों तक गुलामी का अपमान सहें? - सितंबर 1934 परेल (मुंबई) - Page 426

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रहा है, नागपुर की तरफ क्या घटित हो रहा है, या फिर कोंकण में क्या चल रहा है, इस बारे में यथार्थ ज्ञान पाकर हम सबमें एक संवेदना उत्पन्न होनी चाहिए। उसके अनुसार हमें उपाय योजना भी करनी होगी। अपने समाज के एक जोरदार, आजाद

खयालों वाला तथा स्वावलंबी अखबार के बगैर यह सब करना संभव नहीं है। इस कार्य की ओर ध्यान देकर आपमें से हर किसी को अपना अखबार जीवित रखना अपना कत्तव्य है, ऐसा लगना जरूरी है। और शिक्षा से संबंधित इस कार्य में हमें एक बात का खास खयाल रखना होगा कि उसमें परावलंबित्व जरा भी न हो।

अपृश्य समाज के लड़के-लड़कियों को छात्रवृŸा देने को लेकर आजकल हर कहीं हल्ला मचा हुआ है। नारेबाजी की जा रही है। फिर उन्होंने कहा, मुझे बड़ा डर लग रहा है कि स्पृश्य वर्ग से मिल रही आर्थिक मदद के कारण गुलामी वृŸा पनपेगी। छात्रवृŸा स्वीकारने वाले कमजोर दिल के बच्चे छात्रवृŸा देने वाले वर्ग का दास ही बनेंगे। मनुष्य, प्राणि पैसों का दास बनता है। महाभारत की कहानी का उदाहरण लीजिए। भीष्माचार्य जैसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति जानते थे कि कौरवों का पक्ष न्याय का पक्ष नहीं है। पांडवों की मांगें न्यायपूर्ण ही हैं, फिर भी पांडवों के वनवासकाल में कौरवों की चाकरी करके उनका अन्न खाने की वजह से भीष्म कौरवों का पक्ष छोड़ नहीं सके। उन्हें पांडवों का नाश करने के लिए सिद्ध होना पड़ा।

लॉर्ड लोथिअन की अध्यक्षता में फ्रेंचाइजी कमिटी पर काम करने के दौरान हम पंजाब गए थे। अस्पृश्य समाज की ओर से गवाही देने के लिए कुछ पढे़-लिखे लोग पंजाब में हैं क्या यह पूछते हुए हमारी खोज जारी थी तब कॉलेज में पढ़ाई कर रहे कुछ बच्चे हमें मिले। आर्य समाज द्वारा चलाए जा रहे छात्रावास में रहकर वे अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे और उसी समाज द्वारा दी जा रही छात्रवृŸा से उनका खर्चा चलता था। उन बच्चों ने मुझे बताया कि आर्य समाज की ओर से उन्हें साफ-साफ बताया गया था कि समाज जैसे बताए, वैसी गवाही अगर वे नहीं देंगे, तो छात्रावास से उन्हें भगा दिया जाएगा, और शिक्षा के लिए दी जाने वाली मदद एकदम बंद कर दी जाएगी। इस धमकी के कारण जाहिर है कि वे हतबुद्धि हुए। उनका वास्तविक मत उस दिन कमेटी के दफ्तर में मैं दर्ज नहीं कर पाया। इससे आप जान जाएंगे कि जिनसे हमें अपने खोए हुए अधिकार वापिस लेने हैं, उनसे मदद की उम्मीद करना धोखादायी है।

आखिर में मैं आपसे एक महत्त्वपूर्ण बात कहता हूं। महात्मा गांधी से अस्पृश्यता निवारण के बारे में जब मेरी बातचीत हुई उस समय उन्होंने मुझसे कहा कि कई शतकों से हिंदू समाज में अस्पृश्यता जडें़ जमा कर बैठ चुकी है इसलिए वह जल्दी से नष्ट नहीं हो सकती। इसलिए आप हिंदू समाज को थोड़ा समय दें। कई शतकों