410 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पुरानी रीति अचानक नष्ट नहीं हो सकती। उनकी यह बात बिल्कुल सच है। उसे नष्ट करने के लिए लगातार कोशिशें करते रहना चाहिए यह भी सच है। लेकिन पहले यह जान लेना जरूरी है कि वह रीति नष्ट करना यानी करना क्या है? महात्मा गांधी जी ने मंदिर प्रवेश का आंदोलन शुरू किया तब उन्होंने कहा कि अस्पृश्यों को मंदिर में प्रवेश कराने का उद्देश्य रखते हुए हिंदू धर्म की अत्यंत पवित्र जगह में अगर उनको प्रवेश दिया गया तो अस्पृश्यता अपने आप नष्ट हो जाएगी। मंदिर से कुएं, तालाब, विद्यालय आदि के द्वार फिर उनके लिए अपने आप खुल जाएंगे। उनकी इस सोच का मतलब यही था कि अस्पृश्यता की जड़ पर ही वार करके अपने समाज पर उसकी जो जकड़ है उसे ढीला करना। उनकी नजर में मंदिर प्रवेश ही इस समस्या को हल करने की पहली और आखरी सीढ़ी थी। मैं इस सोच को नहीं मानता। अस्पृश्यता चातुर्वर्ण्य समाज व्यवस्था की बुनियाद पर खड़ी इमारत है। हिंदू समाज में फैला जातिभेद उसका प्रतिबिंब है। हिंदू समज को ग्रस (निगल) लेने वाली इस कल्पना को खत्म कर समाज के हर व्यक्ति को जब तक समान शिक्षा का अधिकार नहीं दिया जाता या फिर जातिभेद की मूल कल्पना को ही जब तक विरोध नहीं किया जाता, तब तक हिंदू समाज का सर्वतोपरि विकास असंभव है। अस्पृश्यता की जडें़ हिंदू समाज की सतह पर ही केवल नहीं फैली हैं, वह जातिभेद की इस कल्पना में गहरे भीतर तक गई हैं और वहां जडें़ जमा चुकी है। अस्पृश्यता को जड़ समेत अगर नष्ट करना हो तो जातिभेद की इस जड़ को उखाड़ फेंकना होगा। मेरी बुद्धि इतनी मंद नहीं कि मैं यह जान न सकूं कि यह बेहद कठिन कार्य है और इसमें काफी समय लग सकता है। मेरा बस यही कहना है कि इसी को अपना जीवनोद्देश्य बना कर या इसे प्रमुख तत्त्व मान कर जो भी जरूरी लगें वे उपाय कीजिए। आपको क्या उपाय करने चाहिए, इस कार्य के ब्यौरे के बारे में मेरा कोई खास आग्रह नहीं है। अलग-अलग जगहों में, अलग समय पर, विभिन्न समाजों में वह भिन्न-भिन्न हो सकता है, लेकिन खेद की बात यह है कि हिंदू समाज को यह तत्त्व ही मान्य नहीं है। क्या किया जा सकता है?
हिंदू धर्म में बेहद बुरी स्थिति में जो समाज है, उस अस्पृश्य समाज को यह जानने और तय करने का न्याय युक्त स्वनिर्णय का अधिकार होना ही चाहिए कि अपने पर कौन से अत्याचार हो रहे हैं और उनसे मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए। लेकिन हिंदू समाज इस बात को मानने के लिए ही तैयार नहीं है। अस्पृश्य समाज को आज तक गुलामी में रख कर भविष्य में वे किन हालात में रहेंगे, यह तय करने का अधिकार हिंदू समाज अपने हाथ में रखना चाहता है। राजनीतिक क्षेत्र में डोमिनियन स्टेटस यानी उपनिवेशी स्वराज का ध्येय सामने रखते हुए हिंदुस्तानी किश्तों में राजनीतिक अधिकार ले रहे हैं। उसी प्रकार अगर अस्पृश्य समाज अपना