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ध्येय तय करते हुए उसे किश्तों में लेने के लिए हम तैयार हैं यह कह रहा है। लेकिन इन हालात में बुनियादी फर्क है। अंग्रेज सरकार ने हिंदुस्तान को डोमिनियन स्टेटस देते हुए अपनी बराबरी का दर्जा देकर उसी तरह से उसके साथ बर्ताव करने का अपना इरादा कबूला है। लेकिन हिंदू समाज मन का ऐसा बड़प्पन तक दिखाने के लिए तैयार नहीं है। इतना ही नहीं अस्पृश्य समाज को वे अपना कहने के लिए तैयार तक नहीं हैं।
महात्मा गांधी के आमरण अनशन के बाद वरिष्ठ विधि कौंसिल में एक हिंदू मंदिर प्रवेश का बिल लेकर आए थे। महात्मा गांधी के अनशन के बाद हर जगह लोगों में यह बात फैल रही थी कि हिंदुओं के मन में अस्पृश्यों के बारे में प्रेम उमड़ पड़ा है। मंदिर प्रवेश का बिल बिना किसी तरह के विरोध के पास होगा, इस तरह की बढ़ाई भी हांकी जा रही थीं। लेकिन अस्पृश्य समाज उस बिल के भविष्य को लेकर बेफिक्र था, क्योंकि उस बिल में उनकी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने वाला कुछ भी नहीं था। यह बिल हिंदुओं के मंदिर के बारे में था, इसलिए उसके बारे में सोच-विचार की उन्हें जरूरत नहीं थी। इसीलिए न तो जब यह बिल विधिमंडल के सामने था, तब और न उसके निरस्त होने बाद कभी उन्होंने उस बारे में फिकर की। बिल अगर पास होता तो अस्पृश्य समाज खुशी से न तो पागल हो जाता और न ही बिल को वापिस लिया गया, इसलिए उन्हें कोई खेद नहीं हुआ। उनका रुख बस यही था, कि आप अपने मंदिर के बारे में जानिए, हमें क्या! मंदिरों जैसे धार्मिक स्थल निर्माण कर अस्पृश्यों के लिए उन्हें खोल कर उनका प्रेम हासिल करना अथवा उन्हें बंद कर उनमें अस्पृश्यों के प्रवेश पर पाबंदी लगाना हिंदुओं का काम है, हमारा नहीं। लेकिन इतना सयाना हुआ तो वह हिंदू धर्म नहीं होगा! आखिर हुआ वही जो होना था। बिल के पक्ष में कम वोट मिलने की वजह से नहीं वरन् पूरे हिंदू समाज की ओर से हुए करारे विरोध के कारण बिल बनाने वाले इतनी हिम्मत भी नहीं जुटा पाए कि चर्चा के लिए ही सही बिल पेश करते। उस बिल को बगल में दबाकर रंगा अय्यर को वहां से नौ दो ग्यारह होना पड़ा। हमने हिंदू धर्म को अपना हृदय खोलने का मौका दिया, और तटस्थ रह कर जो हुआ उसे देखते रहे।
लेकिन अब इस बिल की मौत के बाद हमें सबक लेना होगा। हिंदू समाज के मन में क्या है, यह अब हमारे सामने पूरी तरह खुल चुका है। अस्पृश्य समाज को वह अपना कहने के लिए तैयार नहीं है, यह भी हम जान चुके हैं। इस तरह हिंदुओं की तरफ से दुत्कारे जाने के बाद हम कब तक उनकी पूंछ पकड़कर चलते रहेंगे? आज कोई अस्पृश्यों को हिंदू समाज का अभिन्न अंग मानने के लिए तैयार नहीं है। जूतों का जितना जरूरी हो उतना इस्तेमाल करने के बाद आखिर उन्हें घर के बाहर ही उतारकर रख दिया जाता है, जरूरत न हो तो उसे फेंक दिया जाता है।