412 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आज हिंदू लोग आपको पैर के जूते से ज्यादा नहीं समझते। आपके साथ गुलामों की तरह ही पेश आने का उनका पक्का निश्चय है। अगर ऐसा है तो यह अत्याचार आप कितने समय तक बर्दाश्त करेंगे? क्या आज की स्थिति आपके स्वाभिमान के अनुकूल है? स्वाभिमानहीन गुलाम अपनी या अपने समाज की कभी उन्नति कर पाया है? इस सवाल पर आप अच्छी तरह से सोच लीजिए। अपने को हिंदू कहलाने के एवज में क्या आप जिंदगीभर गुलाम ही रहना पसंद करेंगे? इस सवाल पर सोचने के बाद मेरा मन अपने को हिंदू कहलाने की इजाजत नहीं देता है।
पिछले दो सालों से मैं इस सवाल पर गहराई से सोच रहा हूं और मुझे पूरा यकीन होता जा रहा है कि अगर मुझे अपना स्वाभिमान जिंदा रखना हो, समता के वातावरण में सांस लेनी हो तो मैं खुद को हिंदू नहीं कहला सकता। अगर मैं हिंदू नहीं तो खुद को मैं क्या कहला सकता हूं? ईसाई कहलाऊंगा, मुसलमान कहलाऊंगा या बौद्ध कहलाऊंगा, यह मैं आज आपको नहीं बता सकता। आज तक यदि मैं हिंदू रहा तो आपके साथ और केवल आपके लिए। आपकी अशिक्षा के कारण आपका साथ छोड़ जाता, तो मानों मैं आपको अंधा कर जाता। इसका अहसास था, इसलिए मैं आज तक आपके साथ रहा। लेकिन जल्द ही हम इस बात के बारे में सच-झूठ का फैसला करेंगे और जो भी करना हो, वह सब मिल कर एक साथ करेंगे। अगर ऊंची चट्टान से खाई में कूदना हो तो सब साथ में कूंदेंगे। आज आप इस बात को जानिए और अपने मन में पक्का करके रख लें कि हमारे साथ हिंदुओं का किस तरह का बर्ताव है।
आखिर आज आपने यहां मुझे अपना मन खोल कर बोलने का मौका दिया इसके लिए मैं आप सबके प्रति आभार व्यक्त करते हुए आपसे विदा लेता हूं।’’