5. घनघोर संग्राम करने पर ही मनुष्यता वापिस मिलेगी - 11 अप्रैल, 1925 निपाणी (बेलगांव जिले) - Page 44

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करने वालों को सही समय पर सजा दी गई होती, तो आज हमारे लोगों में दिखाई देने वाली अत्यंत शोचनीय और दयनीय अवस्था हमें कभी प्राप्त न होती। और इस स्वर्ण भूमि में दाने-दाने के लिए मोहताज होकर शर्मनाक स्थिति में दूसरों की याचना करने की नौबत भी हम पर कभी न आती। लेकिन अन्याय का प्रतिकार करने के बजाय हम पुराने रीति-रिवाजों से चिपके रह कर बहुत कमजोर होते जा रहे हैं। हममें प्राण बचा ही नहीं है। हम निस्तेज हो गए हैं। इसका कारण यह है कि हमने बच्चों के प्रति मां-बाप का क्या कर्तव्य है, इसके प्रति जितना ध्यान देना चाहिए था, उतना ध्यान दिया नहीं। अनावश्यक जिम्मेदारियां अपने सिर पर लेने के कारण और उन्हें मनमुताबिक निभा न पाने से हमारे माता-पिता बच्चों की बरबादी का कारण बनते हैं। अनावश्यक जिम्मेदारियों में से एक है - बाप को बेटे की शादी करनी ही चाहिए। शादी करके गृहस्थी बसती नहीं कि यहां बच्चों की परंपरा शुरू हो जाती है। 4-5 साल में एक दो बच्चे हो ही जाते हैं! वे बडे़ भी नहीं होते तब तक उनके नए भाई-बहन उनकी पीठ पर पांव देकर आ जाते हैं! पहले की शादी होती नहीं कि दूसरे की आ धमकती है। फिर बच्चों के बच्चों की चिंता! ऐसा उच्च वर्ण के लोगों में भी होता है मगर उसके अनिष्ट परिणाम हम लोगों को भोगने पड़ते हैं उतने उन्हें नहीं भोगने पड़ते। इसका कारण यह है कि हालांकि वे लोग शादी करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हैं तब भी वे उसके साथ इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि लड़का स्वावलंबी बने और उस पर पड़ी गृहस्थी की और उसके साथ आने वाले बच्चों के पालनपोषण की जोखिम उठाने में वह सक्षम हो इस तरह की शिक्षा उसे दी जाए। हमारे लोग बच्चों की शादी कर देने के अलावा और कुछ नहीं करते। एक तो कर्ज लेकर शादी कर देते हैं। लड़का अशिक्षित होने के कारण और उसमें स्वतंत्र रूप से कमाई करने की योग्यता न होने के कारण वह पहले ही कर्ज के नीचे दब जाता है। और उससे गृहस्थी चलाना जमता नहीं। इस दौरान बच्चे होने पर उस पर एक और बोझ बढ़ जाता है। बच्चों को पढ़ाकर अपने से बेहतर स्थिति में लाने की क्षमता नहीं है। दूसरी तरफ गृहस्थी का विस्तार होने के साथ आय भी बढ़नी चाहिए इसलिए अपने बच्चों को अशिक्षित स्थिति में कहीं काम से लगा दिए जाते हैं और उसकी कमाई से अपनी गृहस्थी चलाते हैं। शादी के झंझट में पड़ने के कारण बाप डूब जाता है मगर वह सयाना नहीं हो पाता। इसके विपरित वह अपने बच्चों को भी दलदल में धकेलकर डुबो देता है!

जिस तरह हमारे समाज में मां-बाप लड़कों का नुकसान करते हैं उसी तरह वे लड़कियों की जिन्दगी में मिट्टी मिलाने का काम भी करते हैं। बच्चों की बचपन में शादी करने से जो नुक्सान होता है उससे ज्यादा लड़कियों को देवदासी बनाने से होता है। हमारे देश में प्राचीनकाल से लड़कियों को हिन्दू देवताओं को समर्पित