77. अस्पृश्य हिंदू के रूप में पैदा हुआ, लेकिन मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा - अक्तूबर, 1935 येवले (नासिक) - Page 431

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अस्पृश्य हिंदू के रूप में पैदा हुआ, लेकिन मैं हिंदू के रूप में नहीं

मरूंगा

शनिवार 12 अक्तूबर, 1935 को डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर नासिक गए थे। सुबह 11 बजे स्टेशन से शहर तक उन्हें बडे़ जुलूस में ले जाया गया। विदगांव, नासिक रोड आदि जगहों पर उन्हें भोज दिया गया। नासिक रोड में उनके नाम से एक सार्वजनिक ग्रंथालय शुरू किया गया था। वहां एक टिन की शेड बनी थी। उसका उद्घाटन बाबासाहेब के हाथों किया गया। उस समय भाषण देते हुए उन्होंने जनता को उपदेश दिया -

”स्वावलंबी बनो। अपने पैरों पर खडे़ होकर अपनी प्रगति का कार्य करो। मुझे यदि कुछ हो जाता है तो मेरे पीछे आंदोलन चलाने के लिए लोग तैयार रहें।“ रात नौ बजे रविवार पेठ की, हिरालाल गली में सहभोज हुआ। उसमें देशपांडे ही अकेले काँग्रस वाले थे। रविवार 13 अक्तूबर, 1935 के दिन डा.ॅ बाबासाहेब नासिक से विंचूर गए। राह में जितने गांव थे वहां लोगों ने उन्हें फूलमालाएं पहनाईं, गुलदस्ते दिए। विंचूर में स्पृश्य वर्ग की तरफ से भी उन्हें चाय-पार्टी दी गई। सुबह वे येवले म्युनिसिपालिटी से मानपत्र स्वीकारने के लिए गए। मानपत्र का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, हमारे आंदोलन से स्पृश्य वर्ग के दृष्टिकोण में बदलाव होगा और वे हमारे साथ अपनेपन से पेश आएंगे, ऐसा तो लगता नहीं! इसलिए हम हिंदुओं से अलग रह कर अपनी प्रगति के लिए स्वालंबन से संघर्ष करते रहेंगे।

13 अक्तूबर, 1935 के दिन नासिक जिले के येवले में मुंबई इलाका दलित वर्गीय परिषद हुई। परिषद के स्वागताध्यक्ष श्री अमृतराव रणखांबे थे। परिषद की शुरुआत रात 10 बजे हुई। इस परिषद में करीब दस हजार लोग इकट्ठा हुए थे। स्वागताध्यक्ष के भाषण के बाद परिषद के अध्यक्ष डॉ. बाबासहेब अम्बेडकर ने अपने भाषण में घोषणा की कि अस्पृश्य धर्मांतर करें। ख्1,

येवले में 13 अक्तूबर, 1935 को हुए ‘मुंबई इलाका दलित वर्गीय परिषद’ में परिषद के अध्यक्ष डॉ. बाबासहेब अम्बेडकर ने अपने भाषण में दलितों को सवर्ण हिंदुओं के अत्याचारों से मुक्ति पाने के आखिरी उपाय के तौर पर धर्म परिवर्तन की जो सलाह दी उसे सुन कर हर हिंदू के अंतःकरण में खलबली मची होगी। इस अवसर पर केवल अध्यक्षीय भाषण में ही इस मार्ग के अवलंब के बारे में कहा नहीं

  1. डॉ. भी. रा. अम्बेडकर चरित्र : चा.ं भ. खैरमोडे, खंड 6, पृष्ठ 84, 85