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गया है, वरन् परिषद ने भी अध्यक्ष की सलाह को अपनाते हुए हिंदू धर्म के अस्पृश्य माने गए वर्ग द्वारा हिंदू धर्म का त्याग कर जिस धर्म में समानता के अधिकार मिलेंगे, उसी धर्म को अपनाने का प्रस्ताव मंजूर किया गया। हिंदू धर्म के जिन अन्यायों के कारण डॉ. अम्बेडकर जैसे व्यक्ति को भी धर्म परिवर्तन करने का निर्णय लेना पड़ा, उन अन्यायों और इन अन्यायों के लिए जो कारण हैं, उन सनातनियों की इंसानियत से कोई वास्ता न रखने वाली खूंख्वार मानसिकता के बारे में भी विचार किया जाना आवश्यक है। डॉ अम्बेडकर की इस सोच की जिम्मेदारी इन सनातनियों पर है, इस बात को हमें भूलना नहीं चाहिए। अस्पृश्यों पर हिंदू धर्म में कितना अन्याय हो रहा है, इस अन्याय से अपने को मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने जो कोशिशें कीं वे सब सवर्ण हिंदुओं के कारण किस तरह नाकामयाब रहीं, आदि बातें उन्होंने अपने निर्णय को घोषित करने से पहले विस्तार से बताईं। सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक आदि हर मामलों में दलितों पर दबाव है। हिंदू धर्म के इस दबाव के कारण मनुष्य होने के नाते मिलने वाले अधिकारों को हासिल करना भी असंभव हुआ है, अब तक किया गया अव्वल दर्जे का स्वार्थत्याग भी व्यर्थ साबित हुआ है। पिछले पांच सालों में नासिक के काले राम के मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलाने के बहाने हिंदू समाज में उन्हें समान अधिकार और दर्जा दिलाने के लिए उन्होंने जो कोशिशें कीं, सत्याग्रह का उपाय किया, लेकिन इन सब उपायों का उच्चवर्णियों पर कोई असर नहीं हुआ। इन सभी बातों का जिक्र करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा,
”सादे मूलभूत अधिकार हमें मिलें, इसलिए स्पृश्य माने गए हिंदू लोगों को मनाने की बेकार कोशिशों में हमने जो धन इकट्ठा किया था, वह भी खर्च हो गया। उन्होंने हमारी बहुत बेइज्जती की लेकिन वह भी हमने सही। लेकिन यह स्वार्थत्याग बेकार ही सिद्ध हुआ। आज तक हमने चुपचाप और शांति से जो परेशानियां झेलीं, उनका थोड़ा सा भी असर हिंदू लोगों के हृदय पर नहीं हुआ। हम यदि किसी दूसरे धर्म के अनुयायी होते और तब भी उदर निर्वाह के हमारे वही काम होते जो आज हैं तो हिंदू लोगों की क्या यह हिम्मत होती कि वे तब भी हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करते जैसे आज कर रहे हैं?
हिंदू धर्म में जन्म लेने के कारण, हमारे जीवन पर जो धब्बा लगा है वही हमारे विकास और उन्नति का अडं़गा बना हुआ है। हमारे अपमान की, सवर्ण हिंदू हम पर जो अत्याचार करते हैं, उसकी यही एक वजह है। अगर यही बात है, तो केवल उस धर्म का ठप्पा लगा कर बैठे रहने से क्या फायदा? इंसान की तरह रहने की भी अगर हमें इजाजत नहीं है, उस हिंदू धर्म के कलश का एक हिस्सा बन कर हम अपनी जिंदगी क्यों बिताएं? ऐसे हालात में इस तरह के धर्म में रहने के बजाय, जिसमें हमें किसी तरह की मान हानि नहीं सहनी पड़े, ऐसे धर्म का हम क्यों न