77. अस्पृश्य हिंदू के रूप में पैदा हुआ, लेकिन मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा - अक्तूबर, 1935 येवले (नासिक) - Page 433

416 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अवलंब करें? अपना दर्जा नीचा मानकर बर्ताव न करना पडे, ऐसे धर्म का स्वीकार करना क्या ठीक नहीं रहेगा?

हिंदू धर्म के त्याग के बाद अस्पृश्य कौन-सा धर्म अपनाएंगे, यह पूरी तरह उनकी अपनी मर्जी पर निर्भर करेगा। उन्हें सिर्फ इस बात का ध्यान रखना होगा कि वे उसी धर्म को स्वीकार करें, जिसमें उन्हें समानता का अधिकार प्राप्त हो।

दुर्भाग्य से मैं भी अस्पृश्य हिंदू का दाग लेकर ही पैदा हुआ। हालांकि यह बात मेरे बस में नहीं थी। लेकिन यह हीन दर्जा झटक कर स्थिति को सुधारना मेरे बस में है और मैं वह करूंगा ही इस बारे में किसी को किसी तरह की आशंका नहीं होनी चाहिए। आज साफ तौर पर मैं आपसे कह रहा हूं कि मैं अपने आप को हिंदू कहलाते हुए नहीं मरूंगा।

हिंदू धर्म में अपना समान दर्जा स्थापित करने के लिए सत्याग्रह का मार्ग अपनाकर कुछ मिलने वाला नहीं है। उस राह की अब जरूरत भी नहीं है। हमें अपना मार्ग अब हिंदू धर्म से अलग और आजाद माना जाना चाहिए। जाहिर है कि नागरिकता और राजनीतिक अधिकारों के लिए हमें अपनी लड़ाई जारी रखनी ही होगी। और इसके लिए आपसी मतभेद, आंतरिक कलह भुला कर एक होकर संगठित ढंग से अपना उद्देश्य हासिल करने की कोशिश करना यही हमारा आज का कर्त्तव्य होना चाहिए।

नए संविधान में दलित वर्ग अपने हक जोरदार ढंग से पेश करें इसके लिए सच्चे, अपनी धुन के पक्के प्रतिनिधियों का चुनाव करना बहुत जरूरी है। हिंदू धर्म की श्रृंखलाओं से जकडे़ न रहते हुए आजादी से अपने कर्तव्य तय करने की अपनी इच्छा है, यह दलित वर्ग दुनिया को स्पष्टता से बता दें, यही मेरी उनसे विनति है। ख्1,

इस भाषण को समर्थन देने का प्रस्ताव डॉ. बाबासाहेब ने रखा और उसे सबने उसे समर्थन दिया। प्रस्ताव खुद बाबासाहेब लिख कर ले आए थे। ख्2,

येवला परिषद में प्रस्तुत किया गया प्रस्ताव -

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अस्पृश्य और स्पृश्य माने गए वर्गों में समता और संगठन बनाने के उद्देश्य से उतनी सामर्थ्य न होते हुए भी इंसान और धन की अपरिमित हानि को सहकर भी मुंबई इलाके के अस्पृश्य वर्गों ने महाड़ के चवदार तालाब के पास और नासिक के

  1. ‘विविध वृŸा’ : 20 अक्तूबर, 1935

  2. डॉ. भी. रा. अम्बेडकर चरित्र : चां. भ. खैरमोडे, खंड 6, पृ. 85