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कालाराम मंदिर के सामने सत्याग्रह किया। कालाराम मंदिर का सत्याग्रह पिछले पांच सालों से लगातार चलाया गया है। लेकिन स्पृश्य हिंदुओं का जरा भी मत परिवर्तन नहीं हुआ है। इतना ही नहीं, स्पृश्यों और अस्पृश्यों में होने जा रहे संगठन को और उससे उत्पन्न होने वाली हिंदू ताकत की भी उन्हें बिल्कुल भी परवाह नहीं है, यह उन्होंने अपने बर्ताव से साबित कर दिया है। इसीलिए अस्पृश्यों की इस परिषद में यह प्रस्ताव मंजूर किया जा रहा है कि, हिंदुओं को मनाने की उनकी कोशिशों का कोई असर नहीं हो रहा है इसलिए अब इसके बाद वे अस्पृश्य वर्ग अपनी शक्ति को इस काम पर बर्बाद न करें। सत्याग्रह की मुहिम अब बंद कर दी जाए। स्पृश्य वर्ग से अपने समाज को अलग कर लें। तथा परिषद के मत में, अस्पृश्य अब हिंदुस्तान के अन्य समाज में अपने समाज को सम्मानजनक और समान स्थान दिलाने के लिए पूरी निष्ठा से कोशिश करें। ख्1,
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर जी का नपा-तुला, मुद्दों पर केंद्रित भाषण और उसके अनुसार रखे गए प्रस्ताव के कारण युवा वर्ग खुश हुआ। धर्म में आस्था रखने वाले बूढे़ और महिलाओं को इस घोषणा ने चकित किया। इसके बावजूद डॉ. बाबासाहेब ने जिस वेदना और ममता भरे कठोर शब्दों के साथ भाषण दिया था, वह सुन कर उन्होंने भी इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दी। हिंदू लोग अस्पृश्यों को निचले पायदान का हिंदू मानकर उनके साथ गलत व्यवहार करते हैं और दूसरे धर्म में उन्होंने प्रवेश किया तो इस परेशानी से उन्हें मुक्ति मिलेगी। अपने बलबूते वे अपनी रोजी रोटी कमाएंगे। शिक्षित होकर अपनी प्रगति हासिल करेंगे। एक घंटे तक इस विषय पर डॉ. बाबासाहेब ने भाषण दिया। सब लोग मंत्रमुग्ध होकर उनका भाषण सुन रहे थे। तालियों के गड़गड़ाहट के बीच प्रस्ताव मंजूर किया गया।
डॉ. बाबासाहेब और उनके सहकारी येवला से लौट आए। और नासिक में जब वे रुके हुए थे, तब मंगलवार, दिनांक 15 अक्तूबर, 1935 और 16 अक्तूबर, 1935 को भंगी (मेघवाल) लोगों ने उन्हें चाय-पार्टी और भोजनपार्टी दी। डॉ. बाबसाहब और उनके सहयोगियों ने अपने साथ भोजन करते हैं, यह देख कर उन्हें बहुत आनंद और उत्साह हुआ।
- ‘जनता’, 15 फरवरी, 1936