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जो धर्म इंसान के साथ इंसानों जैसा व्यवहार नहीं करता उसे धर्म
कैसे कहा जाए?
रविवार दिनांक 8 दिसंबर, 1935 की तारीख निर्भीडकर के जीवन का बड़ा ही
विशेष और संस्मरणीय दिन था। उस रात को मुंबई के फोरस रोड के पास वाली
जयरामभाई स्ट्रीट के पुरानी ढोर चाल में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बैठक होने वाली
थी। घोषणा की गई थी कि उस सभा में धर्म परिवर्तन की घोषणा के नायक डॉ.
बाबासाहेब अम्बेडकर का मुंबई में पहली बार धर्मांतरण के विषय पर महत्वपूर्ण भाषण
होने वाला है। इस कारण उस सभा को कुछ अपूर्व रूप प्राप्त हुआ था, यह बिना
बताए भी सुधी पाठक जान गए होंगे। उस सभा में उपस्थित रह कर अपने विचार
दस हजार के श्रोतृसमुदाय के सामने प्रस्तुत करने का मौका हमें मिला यह हम
अपना परम भाग्य मानते हैं। इस निर्भिडकर के भाग्य में जितने भाग्य के क्षण आए
होंगे, उनमें यह सबसे ऊंचा मौका था। यह सभा महत्त्वपूर्ण थी, ही साथ में सुधारक
स्पृश्य समाज की ओर से अस्पृश्यों के धर्मांतरण की घोषणा करने का हमें जो मौका
मिल रहा था, वह भी महत्त्वपूर्ण और अहोभाग्य का था।
बीते रविवार को रात में ‘सोमवंशीय गुरुदŸा प्रासादिक भजन समाज’ की ओर से
होने वाले बŸासवें सालाना दŸा जयंति उत्सव का आयोजन किया गया था। पिछले
32 सालों से यह उत्सव बडे़ धूमधाम के साथ मनाया जाता रहा है। इस उत्सव में
हजारों अस्पृश्य बंधु-भगिनि उपस्थित रहते थे, बड़ी भीड़ लगती थी। इस उत्सव
की शुरुआत स्व. माधवनाथ मोरे जी ने की थी। उनके हालिया प्रबंधन मंडल में श्री
बालाजी सुडकाजी मोरे, शंकरराव आडेजाधव, माधवराव पारधे, गंगारामपंत मुकादम
और रेवजीबुवा डोलस आदि प्रमुख नेता थे। प्रबंधन मंडल ने इस वर्ष भी बडे़ धूमधाम
से उत्सव का आयोजन किया था, जो बहुत ही आनंद की बात थी। उनकी इस
उज्ज्वल धर्मबुद्धि के लिए हम उन्हें और उनके साथियों को स्पृश्य हिंदू समाज की
ओर से बहुत-बहुत साधुवाद देते हैं।
इस वर्ष दŸाजयंति उत्सव कुल चार दिनों तक धूमधाम से मनाया गया। पहले दिन
यानी शनिवार, दिनांक 7 को श्रीयुत किसन देवीदास बोवा (13वीं गली, कामाठीपुरा),
रामजी रावजी बोरकर (ताडवाडी), रामजी धोंडूजी भालेराव (औचित्यवाडा), रामचंद्र
सदूजी रणदिवे (बटाट्याची चाल) आदि प्रसिद्ध भजनकारों के प्रबंधन में संगीत भजन
प्रस्तुत किए गए।
1.‘‘निर्भीड’’ : 15 दिसम्बर, 1935