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दूसरे दिन हम जिस सभा का वर्णन करने के लिए यह लेख लिख रहे हैं, वह भव्य सार्वजनिक सभा हुई। तीसरे दिन पालखी के जुलूस और भोजन के समारोहों की घोषणा की गई थी। इस उत्सव के लिए हजारों रुपये खर्च किए जाते हैं, और अस्पृश्य समाज कार्यक्रम का आनंद लेता है। इस तरह के उत्सव की एक बहुत ही महत्वपूर्ण सभा के लिए हाजिर रहते हुए भाषण करने का मौका हमें मिला यह हमारे सौभाग्य की ही बात थी। इस साल का यह समारोह अगर आखिरी समारोह साबित हुआ तो हमें जो मौका मिला है वह बहुत ही भाग्यशाली है, इसमें कोई दो राय नहीं।
इस सभा में उपस्थित रहने के लिए पिछले रविवार रात नौ बजे के आसपास हम सभास्थल पर पहुंचे। देवि के एक छोटे से मंदिर के सामने सभा का स्थान सजाया गया था। मंदिर के सामने वाली चौड़ी सड़क सभा के लिए नियोजित की गई थी। मंदिर के ऊपर कपडे़ का एक बोर्ड टंगा हुआ था जिस पर बडे़ अक्षरों में लिखा था ‘बŸासवां दŸा जयंति उत्सव’ मैनेजर - रेवजीबोवा डोलस। मंदिर के सामने पड़ने वाला रास्ता पताकाओं से, कागज के फूलों से बनी छत से, तरह-तरह के झंडों से सजाया गया था। सड़क पर श्रोताओं के बैठने की व्यवस्था की गई थी। वहां बायीं तरफ महिलाएं बैठी हुई थीं। मंदिर के सामने एक बड़ा और सजा हुआ मंच था। उस पर गलीचे और जमखाने फैलाए गए थे। मंच के बीच में एक चौकोर मेज रखी गई थी और उसके पीछे मखमल से सजी दो कुर्सियां रखी थीं। मंच पर अन्य मेहमानों के लिए हरे मखमल के कोच लगाए गए थे। मंच के आसपास और भी कोच, कुर्सियां और बेंच थे। हम जब पहुंचे तब सभा-स्थल पर पांच हजार से अधिक श्रोता इकट्ठा हुए थे। उनमें अस्पृश्यों का अनुपात ज्यादा था इसके बावजूद पांच-पचास मुसलमान, पांच-दस ईसाई, एक बूढ़ा पारसी जैसे दूसरे धर्म के लोग भी बीच-बीच में दिखाई दे रहे थे। एक सज्जन हमें बडे़ प्रेम से मंच के कोच पर बैठा गए। हमारे पड़ोस में श्री अडांगले, और श्री वडवलकर बैठे थे सो बातचीत में बहुत मजा आया। ये अस्पृश्य बंधु आजकल हमारे परममित्र हो बैठे हैं। डॉ. अम्बेडकर और उनके साथियों को ले आने के लिए श्री रेवजी बोवा गए थे। इसीलिए बीच के खाली समय में कुछ मनोरंजन के कार्यक्रम पेश किए गए। हम जब गए तब एक लड़का बड़ी मीठी आवाज में गा रहा था। उसके बाद श्री फालके ने एक पोवाड़ा गाकर सुनाया। उसके बाद जलसे का भी छोटा सा कार्यक्रम हुआ। इस तरह अलग-अलग तरह के कार्यक्रम चल रहे थे फिर भी सभी श्रोताओं का ध्यान डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की तरफ लगा हुआ था। श्रोताओं की संख्या बढ़ते-बढ़ते दस बजे के आसपास दस हजार तक पहुंच गई। आखिर सवा दस के आसपास सभास्थल के पास दो भव्य मोटरें पों-पों करते हुए आकर खड़ी हुईं। इन मोटरों से अपने दोस्तों के साथ डॉ. अम्बेडकर