78. जो धर्म इंसान के साथ इंसानों जैसा व्यवहार नहीं करता उसे धर्म कैसे कहा जाए? - दिसंबर 1935 मुंबई - Page 437

420 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आए। अम्बेडकर के आने की खबर मिलते ही तालियों की गड़गड़ाहट से आसमान गूंज उठा। श्रोताओं ने बाबासाहेब का जितनी गर्मजोशी से स्वागत किया उसे देख कर किसी किरिट कुंडलधारी सार्वभौम राजा को भी उनसे जलन होती। लगातार उनके नाम की जय बोली जा रही थी, तभी डॉ. अम्बेडकर मंच पर रखी मखमली दरबारी कुर्सी पर जाकर बैठे। उनके पड़ोस वाली कुर्सी पर सभा के अध्यक्ष श्री देवराव नाईक बैठे। प्रि. दोंदे, श्री सुरबा टिपणीस, बापूसाहब सहस्त्रबुद्धे, आदि लोग उनके आसपास वाले कोच पर जाकर बैठ गए। अस्पृश्यों के एक और सन्माननीय नेता डॉ. सोलंकी को लिवाने के लिए मोटर गई थी, उनके आने तक जलसा जारी रखा गया। थोडे़ समय के बाद डॉ. सोलंकी आए। व्यवस्थापक मंडल ने उनका भी भली-भांति स्वागत किया। लोगों ने भी तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी सहमति दर्ज की। डॉ. सोलंकी डॉ. अम्बेडकर के पड़ोस वाली कुर्सी में स्थानापन्न हुए और उसके बाद श्री रेवजी बोवा ने कार्यक्रम की शुरुआत की। अध्यक्ष की सूचना को समर्थन दिए जाने के बाद श्री देवराव नाईक ने छोटा सा भाषण दिया। उसके बाद श्री सुरबा टिपणीस का भाषण हुआ।

इसके बाद अध्यक्ष की ओर से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया। डॉ. अम्बेडकर हाथ में एक छोटी छड़ी लेकर टेबल के सामने आकर खडे़ हुए। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा वातावरण गूंज उठा। बाबासाहेब का सिर खुला था, सिर पर उन्होंने कुछ पहना नहीं था। उनकी पोषाक भी बहुत ही सादी थी। लॉंन्ग क्लाथ का पाजामा और सोलापुरी चेक्स का कोट उन्होंने पहन रखा था। अत्यंत गंभीर स्वर में डॉ. अम्बेडकर ने कहा,

”सभापति महोदय और भाइयों और बहनों,

शुरुआत में ही मुझे एक-दो बातों का खुलासा करना होगा। पिछले साल के उत्सव में मैं नहीं आया था। इस साल भी दŸा जयंती जैसे उत्सवों में भाषण करना ठीक नहीं। लेकिन रेवजी बुवा ने जब आश्वासन दिया है कि यह आखिरी उत्सव होगा, तो मैं आया हूं। इस जगह धर्म परिवर्तन जैसे विषय पर बोलना भी ठीक नहीं। लेकिन मुझे अब कुछ बोलना तो पड़ेगा। धर्मांतरण के बारे में मेरे मत पक्के हैं। मैं धर्मांतरण करूंगा ही, लेकिन अभी थोड़ा रुका हुआ हूं, ताकि आपका मन जान सकूं। आप सब, सात करोड़ लोग अगर धर्म परिवर्तन करेंगे तो ही मैं भी करूंगा। एक भी व्यक्ति पीछे ना रहे। थोड़ा थोड़ा करके किसी दूसरे धर्म में जाओगे तो आपका नुकसान होगा। सात करोड़ लोगों को एक साथ धर्म परिवर्तन करना होगा। दस हजार मुसलमान बने, चार हजार ईसाई बने तो इस तरह की फूट से कल्याण नहीं होगा। आपमें से केवल कुछेक लोग ही मेरे साथ अन्य धर्म में आए, तो मैं आपका