78. जो धर्म इंसान के साथ इंसानों जैसा व्यवहार नहीं करता उसे धर्म कैसे कहा जाए? - दिसंबर 1935 मुंबई - Page 438

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कल्याण नहीं कर सकता। आप अगर सब लोग आओ तो मैं आपका कुछ हित कर सकता हूं। सबका निश्चय होने में थोड़ा समय तो लगेगा ही! मैं उतनी देर रुकने के लिए तैयार हूं। लेकिन यह समय मैं अस्पृश्यों को दे रहा हूं, स्पृश्यों को नहीं! सब आ आकर मुझसे पूछते हैं, आपसे कोई नहीं पूछता होगा। मुझे बताना पड़ता है। लेकिन उसका मतलब यह नहीं कि धर्म परिवर्तन का मेरा निश्चय बदलने वाला है। मेरा निश्चय पक्का है। लेकिन मुझे आपका क्या विचार है, इसका पता चलना चाहिए। हिंदू धर्म कोई धर्म नहीं है। यह तो रोग है, महारोग है! हम जहां बैठे थे, उस ओर मुड़कर उन्होंने कहा, इस रोग से हम नहीं, हिंदू लोग ग्रस्त हैं। हम अस्पृश्यों ने क्या पाप किया है? कुछ भी तो नहीं। जो भी पाप किए हैं वे स्पृश्यों ने किए हैं। उनके फल हमें भुगतने पड ़रहे हैं। इसीलिए हमें दूर जाना होगा। हिंदु अगर इस रोग से अपने को मुक्त करना चाहते हों, तो वे भी हमारे साथ आएं। हमसे कहा जाता है कि अस्पृश्यता नष्ट करने की कोशिश कीजिए, लेकिन यह संभव नहीं है। हिंदू धर्म, धर्म ही नहीं रहा है। अगर कोई यह मानता है कि हिंदू धर्म है तो वह आकर मुझे यह प्रमाणित कर दिखाए। हिंदू धर्म जहर है। जहर अमृत में बदलना असंभव है। जिस धर्म के लोग अस्पृश्य वर्ग के लोगों के साथ समानता का व्यवहार नहीं करते, इंसानियत के साथ पेश नहीं आते, उसे धर्म कैसे कहा जाए? जहर को अमृत बनाने का तरीका अगर कोई जानता हो तो वह मुझे बताए। वैसे, जहर को अमृत में बदलना संभव ही नहीं। कोई व्यंजन अगर नमकीन हो जाए,

खट्टा हो जाए तो उसे ठीक किया जा सकता है। मैं खुद खाना पकाना सीख गया हूं। बहनों की तरह मैं भी बढि़या खाना पका लेता हूं। शायद आपको पता न हो, कभी अगर और कोई काम न मिले तो कम से कम बावर्ची का काम कर सकूंगा, यह सोच कर मैंने खाना बनाना सीख लिया है। कोई व्यंजन अगर ज्यादा नमकीन हो जाए तो उसमें से नमक की मात्रा कैसे कम की जा सकती है, यह मैं उन्हें बता सकता हूं। नमकीन चीज जब पक रही हो तब उसमें कागज का एक टुकड़ा डाल कर रखें, तो उस व्यंजन का नमक कम हो जाता है। (तालियां) कहने का उद्देश्य यही है कि बाकी सब कुछ बदला जा सकता है, लेकिन जहर का अमृत नहीं किया जा सकता। अभी परसों मुझे गुजराती में लिखा एक खत मिला है। उसमें जो लिखा गया है, वह जानेंगे तो हिंदू धर्म जहर है इस बारे में आपको भी यकीन हो जाएगा। गुजरात के एक गांव में जैन छात्रों का एक बोर्डिंग है। वहां करीब बीस बच्चे रहते हैं। उनकी देखभाल के लिए एक बूढे़ जैन सुपरिंटेंडेंट की नियुक्ति की गई है। उस बोर्डिंग के परिसर में एक अस्पृश्य दंपति काम करते थे। उनका तीन-चार साल का एक बच्चा था। उसे पीठ पर लाद कर वे बोर्डिंग की तरफ काम के लिए जाते वक्त ले जाया करते थे। एक दिन उस बच्चे को बोर्डिंग के परिसर में खेलने के लिए छोड़ कर मां-बाप कहीं बाहर काम के लिए गए। यहां बच्चा खेलते-खेलते