5. घनघोर संग्राम करने पर ही मनुष्यता वापिस मिलेगी - 11 अप्रैल, 1925 निपाणी (बेलगांव जिले) - Page 45

28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करने की जो अजीब परंपरा चल रही है उसका प्रसार कुछ क्षेत्रों में हम लोगों के बीच भी हुआ है। शायद पहले यह प्रथा सद्भावना से प्रेरित रही होगी। लेकिन आज के समय में देवदासी यानी समूचे विश्व की शोषित नारी यही एक सच्चाई है। वह अपना शरीर बेच कर अपने रिश्तेदारों के पेट भरे! मुरली (देवदासी) बनाने की कुरीति जहां जारी है वहां इसकी जड़ें इतने गहरे तक पैठी हैं कि इस प्रथा का शिकार बने लोग कानून की भी परवाह नहीं करते। ये लोग केवल अपनी लड़की के हितों के ही दुश्मन नहीं हैं, वरन् समाज के भी दुश्मन हैं। क्योंकि उनकी इन करतूतों से समाज की आद्य व्यवस्था यानी परिवार व्यवस्था पर ही सीधे आघात होता है। उसमें एक पति और एक पत्नी परिवार का स्वरूप मान्य और स्वीकृत है। कुटुंब का मतलब समाज द्वारा अपने लोगों के संरक्षण और पालनपोषण के लिए स्थापित की गई संस्था है। इस संस्था को चलाने वाले दंपति जितने शुद्ध, सात्विक और स्वाभिमानी होंगे, उतनी ही उनकी संतान शुद्ध, सात्विक और स्वाभिमानी हो सकेगी। एक महिला के बहुत सारे पति हों और एक पुरुष की बहुत सारी पत्नियां हों यह पारिवारिक पद्धति ठीक नहीं है।

हम आज मानसिक दुर्बलता के कारण ही दूसरों के गुलाम बने हैं। इसकी वजह यह है कि भगवान ने जिनके हाथों में हमारा भविष्य दिया है वे अपने महत्वपूर्ण कर्त्तव्य को नहीं जानते-पहचानते। यदि यह परख होती तो हमारी स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती। यह दुख की बात है कि हमसे लोग गुलामों जैसा बर्ताव करते हैं। मगर हमारे कर्तव्यशून्य मां-बाप आगे-पीछे का विचार न करके बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करके गुलामों का यह बाजार सजाए ही रखते हैं, यह कितने अनर्थ की, दयनीयता की बात है।

सज्जनों, हम कहते हैं कि हमारी हालत बेहद खराब है। लोग हमारे साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार करते हैं ये सब बातें सही हैं। मगर यह अन्याय खत्म कैसे होगा? आपको स्वीकार करना होगा कि एक बार जब वर्चस्व मढ़ा जाता है, तो उसके खत्म होने का उपयुक्त मार्ग यही है कि जिन्हें यह सब भुगतना पड़ा है वे सयाने बनें, सामर्थ्य हासिल करें और प्रतिपक्ष का मुकाबला करके और उन पर हावी होकर उनके चंगुल से छूट जाएं। इस तरह का सयानापन, हौसला और सामर्थ्य हमें कब और कैसे मिलेगा? जिन कारणों से हममें सयानापन और सामर्थ्य नहीं है वे सभी कारण ऊंची जातियों के दबाव के कारण पैदा नहीं हुए और शायद वैसा हो भी तो उनमें से कुछ कारणों को खत्म करना हमारे हाथ में नहीं है ऐसा नहीं है। हम लोगों को जितना बेकार भोजन खाना पड़ता है उतना किसी और को खाना नहीं पड़ता! लेकिन इस बारे में हमारे लोगों ने कभी शिकायत की है? इतना ही नहीं, इसके विपरीत, कई लोग गांव से रोटी के टुकड़े मांग कर लाने पर भी कितना अभिमान करते हैं। बाकी