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इतना कहकर अचानक डॉ. अम्बेडकर ने अपना भाषण पूरा किया। गंभीर होकर वे अपनी जगह पर जाकर बैठ गए। भाषण पूरा करने के समय उनका चेहरा बहुत ही गंभीर और गुस्से से तमतमाया हुआ लग रहा था। वे इतना भावविह््वल हो गए थे कि उनके मुंह से आगे कोई शब्द ही निकल नहीं पा रहा था। उन्होंने अचानक भाषण
खत्म तो किया, लेकिन श्रोताओं के मन पर उसका बेहद गहरा असर हुआ। उनका बात करने का तरीका एकदम सीधा-सादा और मुंहतोड़ था। तीखे शब्दों से वे श्रोताओं के दिल को चीरते चले गए। विशिष्ट, मध्यम स्वर में उन्होंने अपना पूरा भाषण किया। आवाज में कोई उतार-चढ़ाव नहीं, अलंकारिक भाषा का नखरा नहीं। उन्होंने बहुत ही छोटे और अलग-अलग वाक्यों का प्रयोग किया। भाषण के बाद बिना ज्यादा कुछ बोले सभा बर्खास्त हुई। अध्यक्ष ने समारोह का समापन वाला भाषण न करते हुए, एक तरह से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के बारे में अपना आदर व्यक्त किया। इतना ही नहीं, इसके पीछे उनकी कूटनीति भी थी। अध्यक्ष ने भाषण नहीं किया, इसलिए श्रोताओं के मन पर डॉ .बाबासाहेब अम्बेडकर के शब्द ज्यादा देर तक असर करते रहे। आखिर में केवल फूलमालाएं और गुलदस्ते समर्पण करने का कार्यक्रम हुआ। डॉ. अम्बेडकर, डॉ. सोलंकी, श्री देवराव नाईक आदि सभी नेताओं को करीब पचास फूलमालाएं एवं गुलदस्ते भेंट किए गए। समारोह पूरा होने के बाद लोगों ने डॉ. अम्बेडकर के नाम की जयकार की। उसके बाद सभा का कामकाज समाप्त हुआ। डॉ. अम्बेडकर आदि नेता लोगों की भीड़ में रास्ता बनाते हुए अपनी मोटर की तरफ बढ़ चले।