79. धर्म परिवर्तन से सभी अल्पसंख्यकों का कल्याण होगा - जनवरी 1936 पुणे - Page 445

428 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आपके ऊपर रहे इसलिए। उनके फेंके हुए दया के टुकडे़ चबाकर हम हमेशा के लिए उनके दरवाजे पर उसके गुलाम बन कर पडे़ रहें इसके लिए है। उन सभी लोगों से मेरा यही कहना है कि अब स्पृश्य हिंदू मेरे सामने अगर भगवान को भी लाकर खड़ा कर दें तो तब भी मैं हिंदू धर्म छोड़ कर जाने वाला हूं। (तालियों की गड़गड़ाहट, जयकार की ध्वनियां, रणभेरियों और अन्य वाद्यों की आवाज) अब इसके बाद स्पृश्य हिंदू अस्पृश्यों के लिए यदि कुछ करते हैं तब भी मैं जाऊंगा और नहीं करते हैं तब भी मैं जाऊंगा। (तालियां)

धर्म परिवर्तन किसी इक्के-दुक्के व्यक्ति के द्वारा नहीं, बल्कि पूरे अस्पृश्य समाज के द्वारा इकट्ठा किया जाना है। धर्मांतरण करने से हमारे लिए स्वर्ग के द्वार

खुलेंगे, या हम पर अमृत की धारा बरसेगी, ऐसा मेरा बिल्कुल भी कहना नहीं है। हमारे सिक्ख, ईसाई या मुसलमान होने पर भी अपना भविष्य बनाने के लिए हमें लड़ना तो पडे़गा ही। हम सब यह बात जानते हैं। जाहिर है कि मुसलमान होने से हम सब नवाब नहीं बनेंगे, सिक्ख बनने पर सरदार नहीं होंगे और ईसाई बनने पर पोप नहीं होंगे। (हंसी की आवाज) कहीं भी क्यों न जाएं हमें लड़ाई तो करनी ही पडे़गी। इसलिए, लड़ाई लड़ने के लिए हमें अपनी संघशक्ति को बढ़ाना होगा। निजी फायदे के लिए हमें चोरी-चोरी धर्म परिवर्तन नहीं करना है। जहां जाएंगे वहां सिर पर कफन बांध कर लड़कर अपने लिए जगह बनानी होगी। इसी निश्चय के साथ हमें धर्मांतरण करना है। कल हम लोग जब मुसलमान या ईसाई बनेंगे तब वे लोग हमें महार ईसाई कह कर अलग चर्च में जाने के लिए कहेंगे, तो हम चर्च में आग लगा देंगे। मैं कोई सीधासादा इंसान नहीं हूं। जहां भी जाऊंगा कांटे की तरह चुभता रहूंगा! (हंसी और भरपूर तालियां) इसीलिए मैं आपसे बार-बार कहता हूं कि धर्मांतरण करने का निश्चय पक्का हो तो अकेले जाकर कहीं फंस ना जाना। आज ही कोई ईसाई या मुसलमान न बनिए। अपनी इस घोषणा से कई लोगों की आश बंधी है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूं। मैं अपने महार भाइयों से बस इतना ही कहना चाहता हूं कि भाइयों, अस्पृश्यों के बीच का जातिभेद कम से कम इसके बाद तो मत ही कीजिए (तालियां)। महारों से ब्राह्मण समाज का आधिपत्य सहा नहीं जाता, उसी तरह अस्पृश्यों के बीच मांग, भंगी आदि जो अल्पसंख्यक हैं, उन्हें भी महारों की वर्चस्विता नहीं चाहिए। उनकी यह मांग बिल्कुल जायज है। खुद मुझे महार जाति के बारे में कोई खास लगाव या अभिमान नहीं लगता। मैं केवल इस जाति में पैदा हुआ और मेरी शिक्षा और ज्ञान का अपने समाज के लोगों को फायदा देने के उद्देश्य से मैंने अपने कार्य की प्रथम शुरुआत इस जाति में की।

महाराष्ट्र में अस्पृश्यों में महारों की संख्या अधिक है। इसलिए वे यह बात जानें कि अल्पसंख्यकों की हमेशा जिस तरह बुरी हालत होती है, उसी तरह अस्पृश्यों के