430 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मेरा जो मान-सम्मान है, वह मेरे ईसाई या मुसलमान हो जाने पर नहीं बचेगा। क्योंकि उस समाज में इस तरह पढ़े-लिखे कई लोग हैं। उन्हीं में से मैं भी एक बन जाऊंगा। इसलिए इस तरह चलने में मेरा कोई निजी फायदा नहीं है। उल्टे इसमें मेरा नुकसान ही है। लेकिन जिन्होंने पूरे भरोसे के साथ मुझे यह जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें नरक में ही सड़ता रख कर मुझे बड़प्पन हासिल नहीं करना है। उनकी मुक्ति के लिए मैं अपना सब कुछ त्यागने के लिए तैयार हूं। (तालियां) अपने आंदोलन का कोई आधार है, इसमें कोई दो राय नहीं। वरना एक-दूसरे की विरोधी दो पार्टियों से, ”एक करोड़ रुपया देंगे“ का प्रस्ताव नहीं आता। अपने आंदोलन की बुनियाद में निश्चित तौर पर अधिष्ठान है।
आज समय बड़ा कठिन है। अंग्रेजी में जिसे ‘नाऊ ऑर नेवर’ (Now or never) कहते हैं वैसी स्थिति आन पड़ी है। इसीलिए कहता हूं, सावधान रहें, जागरुक रहें। काम तभी संपन्न होते हैं, जब हम समय और स्थिति का उचित सामंजस्य कर पाएं। इसीलिए, अपना निर्णय इस क्षण ले लीजिए।
मैं कोई इतना पागल नहीं कि यह समझूं कि आज के आज, चुटकी बजाते ही धर्म परिवर्तन होकर पूरा का पूरा अस्पृश्य समाज किसी दूसरे धर्म में समा जाएगा। जो लोग मुझे रुकने के लिए, धीरज बनाए रखने के लिए कहते हैं, मैं उन लोगों से कहना चाहता हूं कि दस-बीस सालों के बाद जो भी होना है, उसकी हमें आज से ही शुरुआत करनी होगी। समयानुसार अपने आप सब कुछ होगा, यह मानकर बैठे रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने आप कुछ भी नहीं होता। दस बीस सालों के बाद अगर कोई पेड़ आपको देखना हो तो उसके बीज आपको आज ही बोने होंगे। बीज नहीं बोया तो वृक्ष नहीं। और पेड़ नहीं तो फल नहीं। इसीलिए कहता हूं जो हमें ‘ठैरो’ कहेंगे, मान लीजिए कि वे हमारे दोस्त नहीं दुश्मन हैं। अपने संकल्प के अनुसार संगठन के कामों में जुट जाइए।’’ (तालियों की गड़गड़ाहट)