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लोग अच्छे वस्त्र पहन कर घूमते हैं तो हम लोगों को एक धोती पंचा, एक कंबल और एक आठ-नौ गज का मोटे कपडे़ का साफे के अलावा कुछ नहीं मिलता। लेकिन क्या हमारे लोगों ने इस दरिद्रता के प्रति कोई नाराजगी प्रकट की? इसके विपरीत मरे मुर्दे के कफन के कपडे़ लाने के लिए हम हमेशा ही तैयार रहते हैं। सरकार दरबार, कोर्ट-कचहरी में हमें अंदर नहीं लिया जाता मगर हमारे लोगों ने अपने अधिकार छीने जाने के बारे में कभी असंतोष प्रकट किया है? इसके विपरीत ऊंची जातिवालों में से किसी एक ने हमारी मनुष्यता को सम्मान देकर ऊपर बैठने को कहा तो हम उससे यही कहते हैं कि हम इसी लायक हैं। हमारे समाज के माता-पिता ने अपने असली कर्तव्य को पहचान कर कर्ज लेकर बच्चों की शादियां करना या बच्चियों को देवदासी बना कर उनकी कमाई से घर चलाना आदि अक्षम्य बातें छोड़ दीं और उन्हें ज्ञानसंपन्न बनाया तो क्या हमारी हालत ऐसी ही रहेगी? यह सब करना क्या हमारे हाथ में नहीं है? हम अगर उन पर अमल करने लगे तो क्या कोई रुकावट डालेगा?
सज्जनों, हमेशा पुराना ही सोना है कह कर नहीं चलेगा। जो बाप ने किया वही बेटा करे यह परिपाटी ठीक नहीं है। हालात बदलने के साथ-साथ आचार-विचार बदलना भी जरूरी होता है। यदि हमने ऐसा नहीं किया तो हममें परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति कभी नहीं आएगी। केवल वक्त के भरोसे बैठे रहने को हितकारी नहीं कहा जा सकता। वक्त की रफ्तार को देख कर अपने हाथों से जितना काम हो सके उतना करना आवश्यक है। अगर हमने ऐसा नहीं किया तो वक्त तो बदलेगा लेकिन हमारी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा। हमारा बहुत सारा वक्त कोई रचनात्मक कार्य किए बगैर ही चला गया है। अब और ज्यादा वक्त को जाने देना हमारे लिए हितकारक नहीं होगा। इस प्रांत में हमारे लोगों में शिक्षा का बहुत प्रसार नहीं हुआ है। उसी तरह इस प्रात में तंबाकू का सारा व्यापार हमारे लोगों के हाथों में है और वह इतना है कि हरेक बड़ी टोकरी के हिसाब से अगर आठ आने दे तो हर साल पांच-छह हजार रुपए मिल सकते हैं। अगर ऐसा हो सका तो इस प्रांत में लड़कों के लिए 15-20 बोर्डिंग शुरू कर सकते हैं। बोर्डिंग स्कूल अच्छी तरह से चल सकते हैं। मेरा हमारे स्थानीय नेताओं से आग्रहपूर्ण निवेदन है कि उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए। यदि उन्होंने मेरे इस अनुरोध को स्वीकृत किया तो आपके द्वारा किया यह सम्मेलन और मेरा यहां आना सार्थक होगा।