81. आप गुलामों की तरह जीना चाहते हैं या आजाद इंसानों की तरह जीना चाहते हैं? - मार्च 1936 पनवेल - Page 451

434 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया। सौभाग्यवती लक्ष्मीबाई अर्जुन शिरावले ने महिलाओं की ओर से उनके माथे पर कुंकुम का तिलक लगाया। उन पर शुभसूचक अक्षताएं चिपकाईं। यह मंगल विधि देख कर दर्शकों के मन में आनंद की लहरें उठने लगीं। युवकों का उत्साह द्विगुणित हुआ। उनके मुंह से बाबासाहेब के लिए विजय की कामना करने वाली ध्वनि निकलने लगी। फिर मेहमानों ने चाय पी और उसके बाद अलग-अलग जगहों से आए प्रतिनिधि, कार्यकर्ता आदि लोगों से मिलने का सिलसिला शुरू हो गया। हर जगह से आए लोग अपनी दिक्कतों का वर्णन सुना रहे थे। उनमें मुख्यतः भोर संस्थान के सुधागड तहसील के लोग थे।

एक गांव की महारों की बस्ती पर स्पृश्य हिंदुओं द्वारा की गई अत्याचारी कार्रवाइयों के कारण उनका बहुत बुरा हाल था। इसलिए वहां के बारे में जानकारी इकट्ठा करने और वहां के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने श्री बी. टी .तांबे को वहां भेजा था। श्री तांबे बहुत ही उत्साही, सैनिक अनुशासन के और कड़े तेवर वाले कार्यकर्ता हैं। उनके आने से लोगों के मन का डर नष्ट हुआ और वे संकट का सामना करने के लिए तैयार हो गए। इस गांव के कुछ लोगों को साथ में लेकर डॉ. बाबासाहेब की सलाह लेने के लिए वे पनवेल में आए हुए थे।

शनिवार के दिन विषय तय करने वालों की बैठक हुई और दूसरे दिन के अधिवेशन के लिए नौ प्रस्ताव चुने गए। शुक्रवार से ही गांव-गांव से आने वाले लोगों का तांता लग गया। शनिवार की रात तक आने वालों की संख्या करीब 2000 तक पहुंच गई। पनवेल तथा आसपास के इलाके में अस्पृश्यों की संख्या बहुत ही कम है। गांव में एकाध-दो घर अस्पृश्यों के थे। इस दृष्टि से देखा जाए तो 2000 लोगों का इकट्ठा होना, काफी बड़ी संख्या थी। जनसमुदाय के मनोरंजन के लिए पोवाडे (विशेष संगीत प्रकार) और जलसों का आयोजन किया गया था। श्री घेगडे का नासिक के सत्याग्रह पर आधारित पोवाडे को श्री द्वारकाकांत शेजवल ने पेश किया। जलसा पेश करने वाले दो फड यानी मंडलियां विशेष तौर पर मुंबई से बुलाई गई थीं। लोकशिक्षा की नीति को अपनाकर दलितोद्धारक सुस्वर जलसा और नासिक जिला युवक संघ जलसा इन जलसा करने वाली मंडलियों ने अपनी समाज सेवा को परिश्रमपूर्वक जारी रखा था।

दूसरे दिन सुबह 9.30 बजे वहां इकट्ठा लोगों ने जुलूस निकाला। शुरुआत में श्री वसंतराव भातनकर ने लोगों को अनुशासन का महत्त्व बताया और जुलूस में शांति बनाए रखने की विनती की। बाद में एक कतार में तीन-तीन लोगों के साथ जुलूस निकलना तय हुआ। मुंबई के श्री अर्जुनराव सालवी ने सभी लोगों को अनुशासनपूर्वक

खड़ा किया। फिर जुलूस निकला। जुलूस की शुरूआत में पनवेल हनुमान व्यायाम