81. आप गुलामों की तरह जीना चाहते हैं या आजाद इंसानों की तरह जीना चाहते हैं? - मार्च 1936 पनवेल - Page 452

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शाला के स्काऊट का बैंड और बीच बीच में स्थानीय बाजे बज रहे थे।

कायस्थ गली, ब्राह्मण गली, बाजार आदि गांव के प्रमुख रास्तों पर से गुजर कर करीब 11.30 बजे के आसपास जुलूस सभास्थल पर पहुंचा। रास्ते में लोग जुलूस में शामिल होते गए और जुलूस और बड़ा होता गया। रास्ते में ‘अम्बेडकर जिंदाबाद’, ‘हिंदू समाज को धिक्कार है’, ‘भट्टशाही नष्ट हो’, ‘अम्बेडकर कौन हैं? दलितों का राजा हैष्, ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की जय’ आदि नारे लगाए जा रहे थे। जुलूस में आगे श्री संभाजी गायकवाड़, श्री कमलाकांत चित्रे, दादासाहेब पगारे, वनमाली मास्टर, भिखाजी धोंडेराव, वसंत भातनकर, गोविंद बिवकर, भीमराव करडक, रूपाजी पगारे आदि लोग थे। श्री सालवी और उनके अन्य युवा दोस्त घूम-घूम कर जुलूस को नियंत्रित कर रहे थे। पनवेल जैसे छोटे से शहर में यह जुलूस एक अद्भुत बात थी। कुछ समय पूर्व तक नालियों के किनारे-किनारे दुबक-दुबक कर कदम बढ़ाता महार समाज आज छाती ठोंक कर अपने परमप्रिय नेता का और अपनी जाति का जयघोष करता हुआ राजरस्ते पर जुलूस निकाल कर जा रहा है यह देख कर लोगों के हृदय में डर-सा पैदा हुआ। महारों के साये से भी दूर भागने वाले लोग गाड़ी, घोडे़ और लोगों का हुजूम देख कर रुक जाते थे। नाली के पास खडे़ होकर महारों के जुलूस के लिए रास्ता बना रहे थे। यह दृश्य देख कर लगता था कि मानों कालगति ने अपना रुख बदल लिया हो। हजारों सालों से पीडि़त हतभागी दलित वर्ग के भाग्य का आज अरुणोदय हुआ हो जैसे।

गांव के नजदीक के आम्रवन में गाडेश्वरी नदी के तीर पर सभामंडप खड़ा किया गया था। जुलूस के बाद सभी लोगों को अनुशासन से बैठाया गया। सभा की शुरुआत से पहले सभामंडप खचाखच भर गया था। सभा में गांव ही के 40-50 स्पृश्य हिंदू लोग भी उपस्थित थे। कुछ ही देर में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर अपनी मित्रमंडली के साथ वहां हाजिर हुए। श्री अनंतराव चित्रे महाड़ से और श्री गोविंदराव वरघरकर खास इस परिषद के लिए उपस्थित हुए थे। बाबासाहेब आए तब सबने उन्हें खड़े होकर अभिवादन किया। उनके नाम का जयघोष करते हुए उनका स्वागत हुआ। उसके बाद लड़कियों ने सुमधुर स्वर में स्वागत गीत गाया और स्वागताध्यक्ष ने अपने भाषण की शुरूआत की।

उनके भाषण के बाद उस कार्यक्रम के अध्यक्ष के रूप में चुने गए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को फूलमाला अर्पण की गई। डॉ. बाबासाहेब बोलने के लिए उठ कर

खडे़ हो गए तब तालियों की गड़गड़ाहट से सभास्थल गूंज उठा। परिषद का अध्यक्ष स्थान दिए जाने के लिए उन्होंने आभार व्यक्त किया और अपना भाषण शुरू किया। उन्होंने कहा,