81. आप गुलामों की तरह जीना चाहते हैं या आजाद इंसानों की तरह जीना चाहते हैं? - मार्च 1936 पनवेल - Page 453

436 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

”यह हिस्सा मुंबई से काफी नजदीक होने के बावजूद आज से पहले मैं कभी यहां आ नहीं पाया, इसका मुझे खेद है। कई कारणों से मैं आपसे मुलाकात नहीं कर पाया। लोगों में जागृति के लिए हजारों जगहों से मेरे लिए बुलावा आता है, लेकिन हर जगह मेरा पहुंच पाना संभव नहीं होता। मैं शतमुखी रावण नहीं या बदन में राख मल कर जीने वाला संन्यासी नहीं। आप लोगों की तरह ही मुझे भी अपना पेट पालने के लिए काम करना पडता है। मैं भी आप लोगों की तरह हालात से लड़ने वाला आदमी हूं।

आज का कार्यक्रम महत्त्वपू्र्ण होने के बावजूद लंबा भाषण कर मैं आपको टंगा, बैठाकर नहीं रखूंगा। केवल कुछेक मुद्दों के बारे में मैं बोलने वाला हूं। आपका क्या कर्तव्य है और आपको राह बताने वाले की हैसियत से मेरा क्या कर्तव्य है यही मैं आज आप लोगों से कहने वाला हूं।

सज्जनों! पिछले हजारों वर्षों से आप इस देश में रह रहे हो। उसी तरह आपके पड़ोसी भी यहां रह रहे हैं। आप अपनी स्थिति पर गौर करते हुए अपने पास-पड़ोस की स्थिति पर एक नजर डालिए। दोनों स्थितियों की आपस में तुलना कीजिए। पहली बात अगर आपके ध्यान में आएगी, तो वह यही कि आप बाकी समाजों से गरीब हैं। दरिद्री हैं। अन्य समाजों के लिए रोटी कमाने के सभी दरवाजे खुले होने के कारण वे कई तरह के काम कर अपना जुगाड़ कर सकते हैं। उनकी स्थिति आप लोगों से उŸाम है। सभा में जाना है इसलिए आप लोगों ने अपने रोज के फटे-पुराने कपड़े छोड़ कर थोड़े अच्छे कपडे़ पहने हैं शायद। सभा में आप अच्छी तरह से आए इस बात का मुझे संतोष है लेकिन आपकी असली स्थिति क्या है, यह आप ही में से एक होने के कारण मुझे अच्छी जानकारी है। हफ्ते में तीन दिन पेट भर खाना आपको बड़ी मुश्किल से मिलता है। बदन पर एक फटा हुआ कुर्ता और एक लंगोट। वह लंगोट भी जल्दी बदला नहीं जा सकता। इतनी बुरी हालत है आपकी। उसके खिलाफ बताइए सफेदपोश समाज की स्थिति क्या है? आपकी तुलना में सैंकड़ों गुना सुखी हैं। उनके घर पर खपरैलें होती हैं, लेकिन अपने घर पर डालने के लिए आपको बांस या नारियल पŸो भी जरुरत के मुताबिक मिलते नहीं हैं। उनके घर में पीतल के बर्तन होते हैं और आपके घर में मिट्टी के! यह आपकी दीन-हीन स्थिति है! इसका पहला और प्रमुख कारण है कि उनके लिए उपजीविका कमाने के जो रास्ते खुले हैं, वे आपके लिए नहीं हैं। आज आपको डिप्टी कलक्टर, तहसीलदार या पुलिस अफसर की बड़ी नौकरियां नहीं मिलतीं, ऐसा क्यों? क्योंंक आपके बीच पढे़-लिखे नौजवान नहीं हैं, इसलिए। यह बात अगर मान भी लें, तो इनसे छोटे पद वाली भी कई नौकरियां होती हैं। वे भी आपको नहीं मिलती हैं। वहां भी आप के लिए दरवाजे बंद हैं। पुलिस की नौकरी ही लीजिए, क्यों नहीं मिलती आपको पुलिस की नौकरी? इस पद की जिम्मेदारी निभाने