83. वोट बेचना अपराध तो है ही साथ ही वह आत्मघात भी है - मार्च 1936 वेढ़ी पालघर (ठाणे) - Page 461

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ठाणे जिले के पालघर के पास के वेढ़ी नाम के गांव में 29 मार्च, 1936 को ठाणे जिला अस्पृश्य परिषद का पहला सम्मेलन अखिल अस्पृश्य समाज के नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में होना तय हुआ था। इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए मुंबई से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर, कमलाकांत चित्रे, संभाजीराव गायकवाड, श्री वाघ, श्री मडकेबुवा जाधव, श्री गायकवाड़, श्री. अनंतराव चित्रे, श्री शांताराम पोतनीस, श्री. चांगदेव मोहिते, श्री. बापुसाहेब सहस्त्रबुद्धे, श्री. रामचंद्र मोरे, श्री. केणी, जे. पी. वनमाली मास्टर आदि के साथ सुबह मुम्बई से वेढ़ी गांव की ओर निकले। वसई स्टेशन पर चमार समाज ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का स्वागत करते हुए उन्हें पुष्पहार अर्पण कर उनकी जयकार की। दोपहर 11 बजे वेढ़ी के नजदीक वाले सपाला स्टेशन पर सब उतरे। सफाले स्टेशन पर सम्मेलन के लिए मुंबई से आए सभी लोगों का ठाणे जिले के अस्पृश्य समाज की ओर से बडे़ आदर के साथ स्वागत किया गया और डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के नाम की जयकार की गई।

सफाले स्टेशन से वेढ़ी गांव करीब 3 से 4 मील की दूरी पर है। मुंबई से परिषद में हिस्सा लेने आए लोगों को स्टेशन से वहां ले जाने के लिए मोटर, लॉरी और तांगों की व्यवस्था 1-2 दिन पहले से ठाणे जिले के अस्पृश्य समाज द्वारा की गई थी। किराए का बयाणा भी वाहनचालकों को पहले से दे रखा था। लेकिन 28 मार्च, 1936 की रात में यानी सम्मेलन से एक दिन पहले स्पृश्य लोगों के भड़कावे में आकर सफाले के वाहन मालिकों की हुई बैठक में उन्होंने निर्णय लिया कि डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर तथा उनके साथ आने वाले अन्य लोगों को वे अपने वाहनों में बैठा कर नहीं ले जाएंगे। सफाला स्टेशन से बाहर निकल कर लोग वाहन पर सवार तो हुए लेकिन वाहन चालक ने बहाना बनाया कि उसके वाहन में खराबी है। स्टेशन से बाहर कोई और वाहन था ही नहीं। तब सब लोगों ने तांगे की सवारी करने की सोची। वे जब तांगे में चढ़ने लगे तो तांगे वालों ने उन्हें ले जाने से मना करते हुए साफ-साफ बताया कि आज तक कभी अपने तांगे में उन्होंने किसी अस्पृश्य को नहीं बिठाया और आज भी आप में से किसी को न बिठाने के लिए हमने हड़ताल कर रखी है। तांगे वालों की बात सुन कर सभी लोगों ने सोचा कि वे पैदल ही वेढ़ी गांव पहुंचेंगे। तभी हड़ताल में शामिल एक मुसलमान तांगे वाला हड़ताल से अलग हुआ और उसने खुद किराया लेने के लिए तैयार होने की बात बताई। एक

* ‘जनता’ : 4 अप्रैल, 1936