83. वोट बेचना अपराध तो है ही साथ ही वह आत्मघात भी है - मार्च 1936 वेढ़ी पालघर (ठाणे) - Page 464

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रहने वाले मुसलमान आपकी सहायता के लिए, आपको उस स्थिति में मदद का हाथ देने के लिए नहीं आते। उस दौरान धीरज के साथ आपको आपदा, संकट झेलने ही पड़ते हैं। उन संकटों की स्थिति में अपनी हालत असहाय होती है। ऐसी हालत में रहते हुए हम कुछ कर नहीं सकते। इसीलिए आज ऐसी स्थिति में हमें औरों से सहायता लेनी चाहिए।

आज हिंदू समाज की हर जाति स्वार्थी बन कर अपनी जाति के लोगों की ही मदद कर रही है। लेकिन कोई भी हिंदू जाति अस्पृश्य समाज की मदद नहीं कर रही। क्योंकि स्पृश्य हिंदू जातियों के और हमारे कोई संबंध नहीं हैं। इसलिए जो लोग हमारी मदद करेंगे और हमारी असहाय स्थिति में हमारी रक्षा करेंगे, उनके साथ हमें अपना नाता जोड़ लेना चाहिए। आज हम हिंदु धर्म के सभी रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, भगवानों को मानते हैं, इसके बावजूद हिंदू धर्म के लोग हमारी उपेक्षा करते हैं। हिंदू धर्म के लोग हमारे लिए कुछ भी नहीं कर सकते हैं। गांधी ने हाल ही में हरिजन में एक लेख लिखा है। अस्पृश्य वर्ग के कुछ छात्रों ने उनके पास विद्या प्राप्त करने में उनकी मदद पाने के लिए अर्जियां भेजी थीं, विद्यावेतन (स्कॉलरशिप) की मांग की थी। उन अर्जियों का जवाब देते हुए गांधी ने लिखा है कि, अगर रियायतें पाने के लिए ही आपको हिंदू धर्म में रहना हो तो आप यदि हिंदू धर्म छोड़ कर चले जाएंगे, तब भी चलेगा। महात्माजी जैसे व्यक्ति की अगर यह भावना हो तो अन्य सामान्य लोगों की भावना कैसी होगी?

इससे और अन्य कई बातों से सीख यही मिलती है कि हिंदू धर्म के लोगों से आस रखना गलत सिद्ध होगा। अगर अपनी उन्नति और विकास चाहते हो तो सहृदय, सामर्थ्यवान, शीलसंपन्न, निस्वार्थी समाज के साथ जुडि़ए। और इस रह जुड़ने का अर्थ ही है धर्म परिवर्तन करना।

मुसलमान, ईसाई और सिक्ख हम पर करोड़ों रुपये खर्च करने के लिए तैयार हैं। लेकिन हिंदूधर्मियों की प्रवृŸा ठीक उनके विरुद्ध है। गांधी ने स्वराज पाने के लिए जब हिंदू समाज से मदद की याचना की तब उन्हें करोड़-सवा करोड़ रुपया दिया गया। लेकिन जब उन्होंने अस्पृश्यों के लिए हिंदू समाज से मदद की याचना की तब उन्हें पूरे भारत में बड़ी मिन्नतें कर-कर के केवल आठ लाख रुपये मिले। उनमें से चार लाख रुपए दो सालों में खर्च किए गए और सुना है कि, बचे हुए चार लाख भी इस साल-छह महीनों में किसी तरह खर्च दिए जाएंगे। इससे साफ जाहिर होता है कि हिंदू समाज स्वराज के लिए कितना और अस्पृश्योद्धार के लिए कितना स्वार्थ त्याग करने के लिए तैयार है।