87. जिस धर्म में समता, प्रेम और अपनापन नहीं, वह धर्म, धर्म ही नहीं है - मई 1936 अमरावती - Page 475

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जिस धर्म में समता, प्रेम और अपनापन नहीं,

वह धर्म, धर्म ही नहीं है *

वह धर्म, धर्म ही नहीं है

सोमवार, 4 मई, 1936 का दिन अमरावती के अस्पृश्य बंधुओं को सुवर्ण दिन के समान लगा। उस दिन अस्पृश्य समाज के सर्वश्रेष्ठ नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के स्वागत में रेस्ट हाऊस से लेकर नेकोलेट पार्क तक का पूरा रास्ता रंगीन लता पताकाओं से सजा था। गर्मी-प्यास की परवाह किए बगैर हजारों अस्पृश्य बंधु-भगिनी स्टेशन पर डॉक्टर साहब के स्वागत के लिए उपस्थित थे। स्टेशन से लेकर रेस्ट हाऊस तक बैंड के सुमधुर संगीत और लोगों द्वारा उनके नाम की जयध्वनि के साथ उनका जुलूस निकाला गया। शाम छह-सात बजे के करीब नागपुर कैंप म्युनिसिपालिटी के सचिव श्री मेश्राम की अध्यक्षता में सार्वजनिक सभा हुई। पहले स्वागत में कुछ पद्य गाए गए। उसके बाद स्वागताध्यक्ष श्री एस. जी. नाईक एम. एल. सी. के हाथों अमरावती जिले की अलग-अलग संस्थाओं की ओर से करीब-करीब 75 फूलमालाएं और गुलदस्ते डॉ. बाबासाहेब को अर्पण किए गए। स्वागताध्यक्ष की विनती के बाद डॉ. बाबासाहेब भाषण के लिए खड़े हुए तो तालियों की गड़गड़ाहट हुई। यात्रा के दौरान डॉ. बाबासाहेब की सेहत बिगड़ गई थी, और उनका गला खराब था। इसके बावजूद वे बोले। उन्होंने अपने भाषण में कहा,

”सात-आठ सालों के बाद मैं अमरावती आ रहा हूं। पिछली बार अंबादेवी के सत्याग्रह में मैं आया था। उस समय मेरे अस्पृश्य बंधुओं की सत्याग्रह करने की बिल्कुल तैयारी नहीं थी। सत्याग्रह कर जेल में जाने के लिए केवल छह लोग तैयार हुए थे। आज वह स्थिति पलट गई है, यह देख कर मुझे बड़ी खुशी हो रही है। यहां आने से पहले गांधी ने मिलने के लिए मुझे वर्धा बुलाया था। मैं जब वहां गया था तो जमनालाल बजाज मुझे अपनी मालिकियत वाला लक्ष्मीनारायण का मंदिर दिखाने ले गए, जो उन्होंने अस्पृश्यों के लिए खोला था। मैंने मंदिर में प्रवेश किया और जब बाहर आया तो मेरी अस्पृश्यता पहले जैसी बरकरार थी। क्योंकि, उस मंदिर में पूजा करने के लिए फूल और पानी की जरूरत होती है, और वे हमारे लिए उपलब्ध नहीं थे। उस मंदिर में पूजा के लिए जरूरी फूल और पानी अगर हमारे लिए उपलब्ध नहीं हैं, तो फिर हम मंदिर में जाकर पूजा करेंगे कैसे? हमारी अस्पृश्यता नष्ट कैसे होगी? पहले मंदिर को लेकर सत्याग्रह करने में हमें जितना आनंद मिलता था, अब उतना ही तिरस्कार हमें इस विषय को लेकर महसूस होता है। गांधी ने जब स्वराज

* ‘जनता’ 16 मई, 1936