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अपने मिट्टी के मोल जीवन को सोने जैसे दिन प्राप्त हों, इसलिए
धर्मांतरण की आवश्यकता है
रविवार 17 मई, 1936 के दिन कल्याण में डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में अस्पृश्य माने गए समाज का बहुत बड़ा सम्मेलन हुआ। यह सम्मेलन धर्म परिवर्तन की घोषणा को सार्वजनिक समर्थन देने के लिए ठाणे जिले के पूर्व और दक्षिण हिस्से के अस्पृश्यों द्वारा आयोजित किया गया था। परिषद के अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर मुंबई से आने वाले थे। इस बारे में पंफलेटों/हैंडबिल के जरिए पहले ही लोगों को सूचना दी गई थी। इसीलिए, डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को देखने की उत्सुकता से सौ-सवासौ गांवों से आया करीब तीन-चार हजार का अस्पृश्य जनसमुदाय स्टेशन के बाहर उनकी गाड़ी के आने का इंतजार करते हुए खड़ा था। दोपहर 3 बजे डॉ. बाबासाहेब के कल्याण स्टेशन पर उतरते ही वहां के प्रमुख कार्यकŸार्ओं ने फूलों की माला पहना कर उनका स्वागत किया।
स्टेशन से बाहर निकलते ही - ‘ डॉ. अम्बेडकरकी जय ’, ‘ अम्बेडकर जिंदाबाद ’, ‘ थोड़े दिन में भीमराज ’ आदि घोषणाओं से वातावरण गूंज उठा। दर्शनोत्सुक समाज का अंतःकरण डॉ. बाबासाहेब के दर्शन से आनंद से भर आया उन्हें देख कर लोगों में नवचेतना का संचार हुआ। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का शहर के प्रमुख हिस्सों से बड़ा जुलूस निकाला गया। जुलूस के दोनों तरफ स्वयंसेवकों के जथे बडे़ अनुशासन से डॉ. बाबासाहेब का जयघोष करते चले थे। जुलूस के आगे बैंड, बाजे बज रहे थे। जुलूस के बीच बीच में विभिन्न अखाड़ों से आए लोग अलग-अलग खेल दिखा रहे थे। जनता के उस प्रेम को, स्वाभिमान को देख कर देखने वाला निश्चय ही धन्यता महसूस करता।
सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान डॉ. अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन के बारे में थोड़ा खुलासा किया। उन्होंने अपने भाषण में कहा,
‘‘मैं धर्मांतरण के बारे में क्या कहता हूं, यह सुनने के लिए आज आप खासकर यहां आए हैं। इसलिए इस बारे में मुझे विस्तार से बोलना पडे़गा। कुछ लोग सवाल पूछते हैं कि हम धर्म परिवर्तन क्यों करें? इस पर मैं एक प्रश्न उन लोगों से पूछना चाहता हूं कि, धर्मांतरण क्यों न करें? धर्म परिवर्तन क्यों करें इस सवाल का जवाब मैं अपनी जिंदगी में घटी घटनाओं के सहारे आपको बता सकता हूं। मेरी ही तरह आपके
* ‘जनता’, 23 मई, 1936