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जीवन में भी ऐसी घटनाएं घटी होंगी। जिन कारणों से धर्म परिवर्तन करने का निर्णय मैंने लिया, उन्हें आप पर सिद्ध कर दिखाने के लिए मुझे अपने जीवन में घटी कुछ घटनाओं के बारे में बताना होगा। ये ऐसी घटनाएं हैं, जिन्होंने मेरे मन पर हमेशा के लिए छाप छोड़ी है। आज मैं उनमें से दो-तीन बातें आपको बताने वाला हूं।
मेरा जन्म इंदौर के महू में हुआ। उस समय मेरे पिताजी सेना में थे। वे सुभेदार के पद पर तैनात थे। सेना के साथ ही हम लोग रहते थे, इसलिए बाहर की दुनिया से हमारा कोई संपर्क नहीं था। इसीलिए अस्पृश्यता के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। पिताजी ने जब अवकाश प्राप्त किया तब हम सब सातारा में आकर रहे। मैं पांच साल का था तभी मेरी मां गुजर गई। सातारा जिले में गोरेगाव में अकाल पड़ा था इसलिए सरकार ने अकाल के कुछ काम निकाले थे। उस समय एक तालाब बनाया गया। इस तालाब का काम करने वाले मजदूरों को तनख्वाह बांटने के काम पर मेरे पिताजी की नियुक्ति की गई। हम चार बच्चे सातारा में रहते थे और अपने काम के कारण पिताजी गोरे गांव गए। करीब-करीब चार-पांच साल हमने केवल चावल खाकर बिताए। सातारा आने के बाद हमें अस्पृश्यता के बारे में अहसास होने लगा। सबसे पहली बात मुझे याद है कि हमारे बाल काटने के लिए नाई नहीं मिल रहा था। हम बड़ी मुश्किल में फंसे। फिर मेरी बड़ी बहन ने हम सबको बरामदे में बैठा कर बाल काटना शुरू किया। वह अभी भी जीवित हैं। सातारा में इतने नाईं होते हुए भी वे हमारी हजामत क्यों नहीं करते, यह मुझे पहली बार पता चला। दूसरा वाकया था - गोरेगांव में थे तब हमारे पिताजी हमें खत लिखा करते थे। उन्होंने एक बार हमें ‘गोरेगांव आओ’ इस आशय का खत भेजा था। हम रेल में बैठ कर गोरेगाव जाएंगे, इस बात से मैं बहुत खुश था। तब तक मैंने रेल देखी नहीं थी। पिताजी के भेजे पैसों से हमने अच्छे कपडे़ बनवाए। फिर मैं, मेरा भाई तथा बहन के बच्चे, हम सब पिताजी से मिलने निकले। निकलने से पहले पिताजी के नाम खत भेजा था लेकिन नौकर की लापरवाही के कारण वह उन्हें मिला नहीं था। इसलिए हम गोरेगांव कब पहुंच रहे हैं, यह उन्हें पता नहीं चला। हम लोग खुश थे कि हमें लेने के लिए पिताजी नौकर भेजेंगे। लेकिन हमें निराश होना पड़ा। रेल से उतरकर हमने नौकर की राह देखी। मेरे कपडे़ ब्राह्मणों की तरह थे। गाड़ी आकर निकल गई। आधे-पौने घंटे तक हम स्टेशन पर खडे़ इंतजार करते रहे। स्टेशन पर हमारे अलावा कोई नहीं था। हम सब बच्चे ही थे इसलिए स्टेशन मास्टर हमारे पास आकर हमसे पूछने लगा कि आप कौन हैं? आपको कहां जाना है? वगैरा। ‘हम महार हैं’, कहते ही स्टेशन मास्टर को जैसे करंट लग गया हो। बिदक कर वह पांच-छह कदम पीछे हटा। इसके बावजूद हमारे कपड़ों के कारण हम अच्छे खाते-पीते घर के महार हैं, यह उसने पहचाना। हमारे लिए गाड़ी बुला देने का निर्णय उन्होंने लिया। लेकिन