462 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
शाम के छह-सात बजे तक कोई गाड़ी वाला हमें इसलिए ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ, क्योंकि हम महार थे। आखिर एक गाड़ी वाला तैयार हुआ लेकिन उसने एक शर्त रखी कि वह खुद गाड़ी नहीं चलाएगा। सेना में रह चुका था, इसलिए गाड़ी हांक कर ले चलना मुझे कठिन नहीं लगा। हम मान गए, तब गाड़ी वाला अपनी गाड़ी लेकर आया। फिर हम गोरेगांव की राह पर चल पड़े। गांव से बाहर काफी दूरी पर एक नाला था। ‘आप लोग यहीं रोटी खा लीजिए, आगे आप लोगों को पीने का पानी नहीं मिलेगा’, गाड़ी वाले ने कहा। हम नीचे उतरे, हमने रोटियां
खाईं। नाले का पानी इतना गंदा था, उसमें बडी मात्रा में गोबर मिला हुआ था। इतने में गाडी वान कहीं से रोटी खाकर आया। फिर हमारी गाड़ी चलने लगी। काफी रात बीतने के बाद गाड़ी वाला धीमे से गाड़ी में आकर बैठा। रास्ते पर कोई रोशनी नहीं थी, कोई आदमी नहीं। हमें रोना आ गया। इस तरह रात के बारह बजने तक हमने सब्र किया। मन में तरह-तरह के खयाल आ-जा रहे थे। लगा कि हम कभी भी गोरेगांव नहीं पहुंचेंगे। इतने में एक टोल नाके पर हमारी गाड़ी पहुंची। हम सब उसमें से फटाफट कूदे। रोटी खाने के लिए टोल नाके के आदमी से पूछताछ की। मैं पर्शियन भाषा अच्छी तरह से जानता था, इसलिए उस आदमी से बोलने में कोई कठिनाई नहीं आई। लेकिन उसने मुझे बडे़ ही घमंडपूर्ण तरीके से जवाब दिए और पानी के बारे में पूछने पर सामने वाले पहाड़ की तरफ हाथ दिखाया। आखिर जैसे तैसे हमने टोल नाके पर रात बिताई। सुबह फिर से गाड़ी से निकले और दोपहर में अधमरी सी हालत में गोरेगांव आकर पहुंचे।
मेरे जीवन की जो तीसरी घटना मैं आपको बताने वाला हूं वह बड़ौदा सरकार के यहां मेंने जो नौकरी की थी, उससे संबंधित है। बड़ौदा सरकार से स्कॉलरशिप मिलने के बाद मैंने विदेश जाकर उच्च शिक्षा ली। वहां से लौटने के बाद मुझे स्कॉलरशिप की शर्त के मुताबिक बड़ौदा संस्थान में नौकरी करनी थी। लेकिन बड़ौदा में रहने के लिए मुझे एक भी घर नहीं मिला। हिंदू अथवा मुसलमान कोई भी मुझे रहने की जगह देने के लिए तैयार नहीं था। आखिर पार्सी बन कर एक पार्सी सराय में रुकने की सोची। विलायत से लौटा तब मैं गोरा और रौबदार दिखाई देने लगा था। आखिर मैं एदलजी सोराबजी के नाम से एक पार्सी सराय में रहने लगा। रोज के दो रुपयों के हिसाब से सराय का रखवालदार मुझे वहां रहने के लिए जगह देने को तैयार हुआ। इससे पहले ही बड़ौदा संस्थान के मालिक एक पढ़ा-लिखा महार का बच्चा ले आए हैं, यह बात लोगों में फैल चुकी थी। मैं पार्सी बन कर सराय में ठहरा था, इस बात से लोगों को मुझ पर शक हुआ और आखिर मैं ही वह हूं इस बात का उन्हें पता चला। दूसरे दिन मैं खाना खाकर दफ्तर जाने के लिए तैयार हुआ था, तभी पंद्रह-बीस पार्सी लोग हाथ में लाठियां लेकर मुझे मार डालने के इरादे से आ