88. अपने मिट्टी के मोल जीवन को सोने जैसे दिन प्राप्त हों, इसलिए धर्मांतरण की आवश्यकता है - मई 1936 कल्याण (ठाणे) - Page 480

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गए। उन्होंने पहले मुझसे पूछा, ‘ कौन हो तुम? ’ मैंने सिर्फ, ‘ मैं हिंदू हूं ’, यह जवाब दिया। लेकिन इस जवाब से उनकी तसल्ली नहीं हुई। उन्होंने तू - तू मैं - मैं करते हुए मुझसे तुरंत उस जगह को खाली करने के लिए कहा। अपने धीरज का तब मुझे बड़ा सहारा मिला। मैंने बिना डरे उनसे आठ घंटे की मोहलत मांगी। पूरा दिन मैं अपने लिए रहने की जगह खोजता रहा, लेकिन मुझे कहीं भी रहने लायक जगह नहीं मिली। कई दोस्तों के यहां गया। सबने कोई ना कोई कारण बता कर मुझे चलता कर दिया। मैं आखिर इस कदर ऊब गया कि आगे क्या किया जाए, यही मेरी समझ में नहीं आया। एक जगह मैं नीचे बैठ गया। मेरा मन बड़ा दुखी था। आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। (उस समय को याद कर अब भाषण देते हुए डॉ. बाबासाहेब की आंखों से आंसू बहने लगे। अस्पृश्यता की अग्नि से उनका अंतःकरण झुलस-सा गया था।) आखिर कोई इलाज न पाकर बड़ौदा की नौकरी छोड़ कर रातों-रात मुझे मुंबई आना पड़ा। मेरे साथ जो कुछ गुजरा कुछ वैसा ही आप लोगों के साथ भी कई बार हुआ होगा। इसीलिए कहता हूं कि जिस समाज में इंसानियत नहीं, हमारे लिए कोई जगह नहीं उस समाज में बिना-वजह मानहानि झेलते हुए रहने का कोई मतलब नहीं। ऐसे निर्दयी धर्म में जो रहेगा वह गुलाम है। जो इंसानियत चाहता है, वह इस शैतानी धर्म में नहीं रहेगा।

मेरे बाप-दादा हिंदू धर्म में रहे, लेकिन वे पढ़-लिख नहीं पाए। उन्हें हाथ में हथियार लेने की इजाजत धर्म ने नहीं दी थी। संपिŸा कमाना, धर्म के नियमों के अनुसार उनके लिए असंभव था। इस कारण हमारे बाप-दादाओं के लिए ये तीनों चीजें कमाना असंभव हुआ। उच्च शिक्षा लेते समय मुझे संस्कृत भाषा सीखनी थी। लेकिन धर्म के बंधनों के कारण उस समय वह मेरे लिए संभव नहीं हो पाया। लेकिन अब समय बदल चुका है। अब विद्या पाना, संपिŸा कमाना और हथियार धारण करना हमारे लिए मुमकिन है। ऐसी स्थितियों में जिस धर्म ने आपके बाप-दादाओं को गुलामी में तड़पाया, किसी भी बेहतर स्थति का फायदा न उठाने देकर आपको अज्ञान और दरिद्रता में रहने के लिए विवश किया, उस हिंदू धर्म की परवाह आप क्यों करते हैं? अपने बाप-दादाओं की तरह ही आपको भी अगर उसी निर्बल, स्वाभिमानशून्य स्थिति में ही जीवन बिताना हो तो आपसे कोई कुछ कहेगा नहीं। आपकी कोई परवाह भी नहीं करेगा। आज धर्म परिवर्तन का जो महत्व है, वह इसी वजह से है। हिंदू धर्म में रहने से आपको हमेशा गुलाम का ही दर्जा मिलेगा। मैं भले अस्पृश्य रहूं, लेकिन एक हिंदू आदमी जो कुछ कर सकता है वह सब मैं कर सकता हूं। मेरे हित या अहित का सवाल मेरे हिंदू धर्म में रहने या न रहने से हल नहीं होगा। आज की हालत में मैं हाईकोर्ट का जज बन सकता हूं। विधिमंडल में मैं मंत्री भी बन सकता हूं। लेकिन केवल आप लोगों की खातिर, इंसानियत की खातिर आज मुझे धर्मांतरण